बरेली। मानसून से पहले शहर को जलभराव से बचाने के लिए नगर निगम ने निर्माण और स्वास्थ्य विभाग को नाला सफाई अभियान में झोंक दिया है। निगम ने 29 प्रमुख नालों की सफाई के लिए करीब 4.5 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत कर पांच अलग-अलग एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपी है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। शहर के अधिकांश नालों में केवल ऊपर तैर रही झाड़ियां, प्लास्टिक और कचरा हटाया जा रहा है, जबकि नाले के तल में वर्षों से जमा सिल्ट और गाद को हाथ तक नहीं लगाया गया। नतीजा यह कि सफाई का दावा तो किया जा रहा है, लेकिन बारिश आते ही जल निकासी व्यवस्था की पोल खुलने की आशंका बनी हुई है। लोगों का कहना है कि नाला सफाई का मूल उद्देश्य नालों की जल वहन क्षमता बढ़ाना होता है। इसके लिए तल में जमा सिल्ट और गाद निकालना सबसे जरूरी काम है। लेकिन ठेकेदारों ने आसान रास्ता अपनाते हुए केवल झाड़ियों और सतही कचरे की सफाई शुरू कर दी है। इससे नालों की वास्तविक गहराई और क्षमता में कोई सुधार नहीं हो रहा। स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि करोड़ों रुपये के इस अभियान में सफाई के नाम पर बंदरबांट की तैयारी चल रही है। सवाल उठ रहे हैं कि जब सिल्ट निकाली ही नहीं जा रही तो भुगतान किस आधार पर किया जाएगा? कई नालों पर निकाली गई गाद का रिकॉर्ड और उसका निस्तारण भी स्पष्ट नहीं है। बड़े नालों में मशीनों की जगह मजदूरों से काम: नगर निगम के रिकॉर्ड के अनुसार बड़े नालों की सफाई के लिए चेन मशीन, पोकलेन और जेसीबी जैसे भारी उपकरण लगाए जाने थे। लेकिन कई स्थानों पर मशीनों की जगह सीमित संख्या में मजदूर लगाकर खानापूर्ति की जा रही है। इससे न तो गहराई तक सफाई हो पा रही है और न ही तय समय में काम पूरा होने की संभावना दिख रही है। सख्ती के दावे हवा में, ठेकेदार बेखौफ : नगर विकास मंत्री से लेकर मंडलायुक्त, डीएम और नगर आयुक्त तक लगातार समीक्षा बैठकों में समय पर और गुणवत्तापूर्ण नाला सफाई के निर्देश दे चुके हैं। बावजूद इसके ठेकेदारों पर किसी तरह की सख्ती दिखाई नहीं दे रही। हालात यह हैं कि एजेंसियों को न जुर्माने का डर है और न ही ब्लैकलिस्ट होने की चिंता।
बरेली से कपिल यादव
