सीरत-ए-मुस्तफ़ा को अपना कर अपनी ज़िंदगी को नूर-ए-मुस्तफ़ा से करे रोशन : मौलाना फैजान अशरफ हामिदी

सम्भल। जर्नल सेक्रेटरी तंज़ीम उलामाऐ अहले सुन्नत,संभल के मौलाना फैजान अशरफ हामिदी ने 1501वें मिलाद-ए-मुस्तफ़ा ( स• अ• व)के मुबारक मौके पर सीरत-ए-मुस्तफ़ा को अपनाकर अपनी ज़िंदगियों को रोशन करें।” सम्भल ने देश के मुसलमानों, उलेमा, मशायख, मदरसों, मस्जिदों और नौजवानों से अपील की है कि हुज़ूर नबी-ए-करीम की सीरत को केवल जलसों और महफ़िलों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाया जाए।
तंज़ीम उलामाऐ अहले सुन्नत ने कहा कि हुज़ूर नबी-ए-करीम से सच्ची मोहब्बत का तकाज़ा यह है कि हम आपकी पाक सीरत और सुन्नतों पर चलें। हमारा व्यवहार, हमारे घर, कारोबार, रिश्ते-नाते और समाज—हर जगह नबी-ए-करीम की शिक्षाओं की झलक दिखाई देनी चाहिए।
तंज़ीम उलमाए अहले सुन्नत, सम्भल ने अपील की है कि 1501वें मिलाद-ए-मुस्तफ़ा ﷺ के साल को “सीरत-ए-मुस्तफ़ा के अमली साल” के रूप में मनाया जाए और इस मौके पर अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने का संकल्प लिया जाए।
मुख्य संकल्प
नमाज़ और इबादत:
नमाज़ की पाबंदी की जाए, इबादत का शौक बढ़ाया जाए और रोज़ाना ज़्यादा से ज़्यादा दरूद-ओ-सलाम पढ़ा जाए।
सच्चाई और ईमानदारी:
झूठ, धोखा, बेईमानी, वादा ख़िलाफ़ी और बुरी नीयत से बचा जाए। हर मामले में सच्चाई और ईमानदारी को अपनाया जाए।
●माता-पिता और रिश्तेदारों के हक़:
माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार किया जाए। रिश्तेदारों, पड़ोसियों, यतीमों, विधवाओं, गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद की जाए और उनके हक़ अदा किए जाएँ।
कारोबार में ईमानदारी:
व्यापार और लेन-देन में किसी को धोखा न दिया जाए। नाप-तौल में कमी न की जाए और किसी पर ज़ुल्म न किया जाए।
अच्छा अख़लाक और भाईचारा:
मतभेद होने के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान किया जाए। गाली-गलौज, नफ़रत और झगड़े से बचते हुए प्यार, भाईचारे और अच्छे व्यवहार को बढ़ावा दिया जाए।
घर को नबी की सीरत का नमूना बनाएँ:
अपने घरों में मोहब्बत, हया, अदब, दया और अच्छे अख़लाक का माहौल बनाया जाए। बच्चों को नबी-ए-करीम की पाक ज़िंदगी और सुन्नतों से परिचित कराया जाए।
युवाओं से खास अपील
तंज़ीम ने युवाओं से अपील की कि हर युवा अपनी ज़िंदगी में कम से कम एक ऐसी सुन्नत को अपनाए जिससे उसका अपना जीवन और समाज बेहतर हो। इसके साथ ही कम से कम एक दूसरे व्यक्ति तक भी सीरत-ए-मुस्तफ़ा का यह संदेश पहुँचाए।
मस्जिदों और मदरसों की अहम ज़िम्मेदारी
तंज़ीम ने मस्जिदों के इमामों, उलेमा और मदरसों के ज़िम्मेदारों से अपील की कि मस्जिदों में सीरत-ए-मुस्तफ़ा का नियमित दर्स रखा जाए। मदरसों और इस्लामी संस्थानों में ऐसे कार्यक्रम बनाए जाएँ जिनके ज़रिए नबी-ए-करीम की शिक्षाओं, इंसाफ, अच्छे अख़लाक और इंसानियत की सेवा को व्यवहारिक रूप दिया जा सके।
तंज़ीम ने उलेमा और मशायख से भी अपील की कि वे 1501वें मिलाद-ए-मुस्तफ़ा के साल को एक बड़े सीरत-ए-मुस्तफ़ा सुधार अभियान का रूप देने में अपना महत्वपूर्ण किरदार अदा करें और लोगों को केवल नबी-ए-करीम से मोहब्बत का संदेश ही न दें, बल्कि आपकी सुन्नत और पाक सीरत पर चलने की प्रेरणा भी दें।
तंज़ीम उलमाए अहले सुन्नत, सम्भल का संदेश है कि मिलाद-ए-मुस्तफ़ा की खुशी के साथ-साथ हम अपनी ज़िंदगी को भी नबी-ए-करीम ﷺ की सीरत के मुताबिक़ बनाने का संकल्प लें। यही सच्ची मोहब्बत, यही बेहतर किरदार और यही समाज की असली सुधार की राह है।

— सम्भल से सैय्यद दानिश

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