राजस्थान/बाड़मेर- ये भारत देश है साहब। यहां क्रांतियों की कोई कमी नहीं है। आजादी के बाद देश ने एक नहीं, दर्जनों क्रांतियां देख लीं। हरित क्रांति ने खेतों में अनाज की पैदावार बढ़ाई, श्वेत क्रांति ने दूध की धार बढ़ा दी, नीली क्रांति ने मछली उत्पादन को गति दी, पीली क्रांति ने तिलहन के उत्पादन को बढ़ाया, भूरी क्रांति ने कोको और संबंधित कृषि उत्पादन की चर्चा कराई, सुनहरी क्रांति ने बागवानी और शहद जैसे क्षेत्रों को नई पहचान दी। रजत क्रांति ने अंडा उत्पादन बढ़ाया, लाल क्रांति ने मांस और टमाटर जैसे उत्पादन से अपनी पहचान बनाई, इंद्रधनुषी क्रांति ने कृषि के विभिन्न क्षेत्रों को एक साथ जोड़ने का सपना दिखाया।
फिर आई औद्योगिक क्रांति, श्वेत क्रांति, कंप्यूटर क्रांति, सूचना क्रांति, दूरसंचार क्रांति, डिजिटल क्रांति, इंटरनेट क्रांति, मोबाइल क्रांति, स्टार्टअप क्रांति और अब तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की क्रांति भी दरवाजे पर खड़ी है।देश बदलता गया। खेत बदले, बाजार बदले, कारोबार बदला, बैंकिंग बदली, शिक्षा बदली, खरीदारी बदली, भुगतान बदल गया। कभी जिस काम के लिए लाइन लगती थी, आज मोबाइल से हो जाता है। लेकिन एक सवाल आज भी खड़ा है मीडिया में क्रांति क्यों नहीं आई?
और इस सवाल का जवाब किसी सरकार के पास नहीं, किसी राजनीतिक दल के पास नहीं, किसी मंत्री के पास नहीं और किसी अधिकारी के पास भी नहीं। इसका सबसे बड़ा जवाब पत्रकारों के पास है। क्योंकि मीडिया की क्रांति को रोकने वाला सबसे बड़ा पहरा कई बार बाहर नहीं, पत्रकार के भीतर बैठा होता है। कभी पत्रकारिता का मतलब था सत्ता के सामने सवाल। अब कई जगह पत्रकारिता का मतलब हो गया है सत्ता के सामने कैमरा।
पहले पत्रकार खबर खोजता था, अब खबर कई बार प्रेस नोट बनकर पत्रकार को खोज लेती है। पहले पत्रकार घटनास्थल पर जाता था, अब कई बार व्हाट्सऐप ग्रुप में आई सूचना ही खबर बन जाती है। पहले पत्रकार अधिकारी से पूछता था कि काम क्यों नहीं हुआ, अब अधिकारी का बयान ही खबर का शीर्षक बन जाता है।
यह कैसी क्रांति है? सूचना क्रांति ने खबर की गति बढ़ा दी, लेकिन क्या उसने खबर की गहराई भी बढ़ाई? डिजिटल क्रांति ने हर हाथ में मोबाइल दिया, लेकिन क्या हर हाथ में सवाल भी दिया? सोशल मीडिया क्रांति ने हर आदमी को बोलने का मंच दिया, लेकिन क्या पत्रकार को सुनने का धैर्य भी दिया? आज एक खबर कुछ सेकंड में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह खबर उतनी ही तेजी से सच भी होती है?
पत्रकारिता की असली क्रांति कैमरे की गुणवत्ता, माइक के लोगो, स्टूडियो की चमक या चैनल की टीआरपी से नहीं आएगी। वह आएगी सवाल पूछने की हिम्मत से। हरित क्रांति ने खेत में उत्पादन बढ़ाया, लेकिन पत्रकारिता में सवालों का उत्पादन क्यों नहीं बढ़ा? श्वेत क्रांति ने दूध की कमी दूर की, लेकिन पत्रकारिता से डर का दूध कब निकलेगा?
नीली क्रांति ने मछली उत्पादन बढ़ाया, लेकिन मीडिया के समुद्र में सच की मछली कितनी बची है? पीली क्रांति ने तेलहन बढ़ाया, लेकिन पत्रकारिता में वह तेल कौन डालेगा जिससे सत्ता के जाम दरवाजे खुलें? डिजिटल क्रांति ने दुनिया को स्क्रीन पर ला दिया, लेकिन क्या पत्रकारिता जनता की असली समस्याओं को स्क्रीन पर ला पाई?
यही सबसे बड़ा सवाल है। आज पत्रकार के पास पहले से कहीं ज्यादा साधन हैं। मोबाइल है, कैमरा है, लाइव स्ट्रीमिंग है, ड्रोन है, सोशल मीडिया है, वेबसाइट है, यूट्यूब है, पॉडकास्ट है। पत्रकार चाहे तो एक अकेला व्यक्ति पूरा मीडिया संस्थान खड़ा कर सकता है। लेकिन फिर भी कई पत्रकारों की कलम विज्ञापन के सामने रुक जाती है, कैमरा सत्ता के सामने झुक जाता है और सवाल संबंधों के सामने छोटा पड़ जाता है।
फिर क्रांति आएगी कैसे? मीडिया में क्रांति के लिए सबसे पहले पत्रकार को यह तय करना होगा कि उसकी निष्ठा किसके प्रति है सत्ता के प्रति, मालिक के प्रति, विज्ञापनदाता के प्रति,राजनीतिक दल के प्रति या जनता के प्रति।
पत्रकारिता का पहला धर्म जनता के सवाल को आवाज देना है। इसका मतलब यह नहीं कि पत्रकार हर समय सरकार के खिलाफ रहे। अच्छी सरकार का अच्छा काम भी खबर है और खराब काम पर सवाल भी खबर है। विपक्ष का सही सवाल भी खबर है और विपक्ष की गलती पर सवाल भी खबर है।
पत्रकार किसी का प्रचारक नहीं, जनता का सवालकर्ता होना चाहिए। लेकिन मुश्किल यही है। सवाल पूछने में जोखिम है और तारीफ करने में सुविधा। सवाल पूछेंगे तो फोन आ सकता है। विज्ञापन रुक सकता है। नाराजगी हो सकती है। संबंध खराब हो सकते हैं। इसलिए कई बार पत्रकार सोचता है भाई, रहने दो। और यहीं से पत्रकारिता की क्रांति दम तोड़ देती है।
देश में स्टार्टअप क्रांति हो सकती है, डिजिटल पेमेंट क्रांति हो सकती है, अंतरिक्ष क्षेत्र में नई छलांग लग सकती है, तकनीकी क्रांति हो सकती है, लेकिन यदि पत्रकारिता में सवाल पूछने की क्रांति नहीं आई तो लोकतंत्र की तस्वीर अधूरी ही रहेगी। मीडिया की क्रांति का मतलब यह नहीं कि हर पत्रकार सरकार विरोधी बन जाए। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि पत्रकार सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार अपने पास रखे।
आज जरूरत सवालों की क्रांति की है। एक ऐसी क्रांति जिसमें पत्रकार पूछे योजना बनी तो पैसा कितना आया? पैसा आया तो खर्च कितना हुआ? खर्च हुआ तो काम जमीन पर कितना हुआ? काम हुआ तो जनता को फायदा कितना मिला? फायदा नहीं मिला तो जिम्मेदार कौन है?
यही सवाल पत्रकारिता को जिंदा रखेंगे। वरना आने वाले समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस खबर लिख देगा, मोबाइल खबर दिखा देगा, सोशल मीडिया खबर फैला देगा और एल्गोरिदम तय करेगा कि कौन-सी खबर कितने लोगों को दिखाई जाए।
तब पत्रकार के पास क्या बचेगा? सिर्फ एक चीज उसकी विश्वसनीयता। और विश्वसनीयता प्रेस नोट से नहीं बनती। वह बनती है सच खोजने से।
भारत ने हरित क्रांति से लेकर डिजिटल क्रांति तक लंबा सफर तय कर लिया। खेतों में क्रांति आई, उद्योगों में क्रांति आई, संचार में क्रांति आई, तकनीक में क्रांति आई, भुगतान में क्रांति आई, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बदलाव आया। अब बारी पत्रकारिता की क्रांति की है। लेकिन इसकी शुरुआत कोई सरकार नहीं करेगी। कोई मंत्री नहीं करेगा। कोई राजनीतिक दल नहीं करेगा।
यह क्रांति पत्रकार को खुद करनी होगी। जिस दिन पत्रकार ने तय कर लिया कि खबर रिश्ते देखकर नहीं, तथ्य देखकर चलेगी; विज्ञापन देखकर नहीं, जनता देखकर चलेगी; सत्ता की नाराजगी देखकर नहीं, सच देखकर चलेगी उस दिन मीडिया में क्रांति शुरू हो जाएगी।
वरना इतिहास यही पूछता रहेगा हरित क्रांति आई, श्वेत क्रांति आई, नीली क्रांति आई, पीली क्रांति आई, सुनहरी क्रांति आई, औद्योगिक क्रांति आई, सूचना क्रांति आई, डिजिटल क्रांति आई, इंटरनेट क्रांति आई, मोबाइल क्रांति आई, एआई क्रांति आ गई…
लेकिन पत्रकारिता में क्रांति क्यों नहीं आई? और शायद जवाब बहुत सरल होगा क्योंकि पत्रकारों ने क्रांतियों की खबरें तो खूब लिखीं, लेकिन अपनी पत्रकारिता में क्रांति लाने की हिम्मत नहीं की।
— राजस्थान से राजूचारण
