बरेली। मोहर्रम के मौके पर शुक्रवार को शिया समुदाय ने इमाम हुसैन की शहादत की याद में पारंपरिक मातमी जुलूस निकाला। किला क्षेत्र में निकले जुलूस में बड़ी संख्या में अजादार शामिल हुए। हाथों में अलम और परचम लिए लोग कर्बला की जंग और इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद कर रहे थे। वहीं कई अजादारों ने जंजीरों, चाकू और छुरियों से मातम किया। मातम के दौरान उनके जिस्म लहूलुहान हो गए, लेकिन जुबां पर सिर्फ “या हुसैन” की सदाएं गूंजती रही। शुक्रवार को सबसे पहले शिया समुदाय के लोग किला जामा मस्जिद पर एकत्र हुए। यहां मजलिस के बाद मातम शुरू हुआ। अजादारों ने सीना-ज़नी के साथ जंजीरों और छुरियों से मातम कर इमाम हुसैन की शहादत को याद किया। पूरे माहौल में गम और अकीदत का रंग देखने को मिला। मजलिस के बाद मातमी जुलूस किला जामा मस्जिद से रवाना हुआ। जुलूस जामा मस्जिद रोड, जखीरा और जसोली होते हुए किला स्थित इमामबाड़ा फतेह निशान पहुंचा। रास्ते भर “या हुसैन” और “या अब्बास” की सदाएं गूंजती रहीं। सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल भी पूरे रूट पर तैनात रहा। जुलूस के समापन पर इमामबाड़ा फतेह निशान में विभिन्न अंजुमनों ने नौहख्वानी और मजलिस का आयोजन किया। जाकिरों ने कर्बला की घटना का बयान किया, जिसे सुनकर मौजूद लोगों की आंखें नम हो गई। अंजुमनों ने इमाम हुसैन और उनके साथियों की कुर्बानी को याद करते हुए मातम किया।।
बरेली से कपिल यादव
