प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल मर गए हैं!

अब यह बात सुनकर शायद कई लोगों को अजीब लगे, लेकिन एक दौर था जब पत्रकारों के भी नखरे हुआ करते थे—और ये नखरे उनकी कमजोरी नहीं, पत्रकारिता की ताकत हुआ करते थे।

खासकर प्रेस कॉन्फ्रेंस में।

प्रेस कॉन्फ्रेंस का मतलब कभी यह नहीं हुआ करता था कि कोई नेता, अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति माइक के सामने बैठ जाए, अपना भाषण पढ़े और पत्रकार सिर हिलाते हुए उसे नोट कर लें।

प्रेस कॉन्फ्रेंस का मतलब था—सवाल।

ऐसे सवाल, जिनसे सामने बैठे व्यक्ति को असहज होना पड़े। ऐसे सवाल, जिनका जवाब पहले से तैयार कागज में न हो। ऐसे सवाल, जिनके लिए दो मिनट नहीं, कभी-कभी दो घंटे की तैयारी करनी पड़े।

अगर आपको सिर्फ अपनी बात कहनी है, तो प्रेस नोट जारी कर दीजिए। उसे पत्रकारों में बांट दीजिए। जिसे खबर बनानी होगी, बना लेगा।

लेकिन पत्रकारों को बुलाकर लंबा भाषण देना और फिर दो औपचारिक सवालों के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म कर देना—यह संवाद नहीं, प्रचार का मंच है।

और सबसे चिंता की बात यह है कि अब इस बदलाव के लिए केवल आयोजक ही जिम्मेदार नहीं हैं।

पत्रकार भी बदल गए हैं।

कभी पत्रकार सवाल के जवाब से संतुष्ट नहीं होता था तो अगला सवाल दाग देता था—
“आपने जो कहा, उसका आधार क्या है?”
“लेकिन रिकॉर्ड तो कुछ और कहता है।”
“आपके पिछले बयान से यह बात अलग क्यों है?”
“इसका जिम्मेदार कौन है?”

आज कई जगह हाल यह है कि सामने वाला कुछ भी कह दे—पत्रकारों की नोटबुक चल पड़ती है और सवालों की जगह सिर्फ कैमरे के लाल बल्ब जलते रह जाते हैं।

जो कहा गया, वही खबर।
जो बताया गया, वही तथ्य।
जो दावा किया गया, वही सच।

फिर पत्रकार और प्रेस रिलीज में फर्क ही क्या रह गया?

पत्रकारिता का काम किसी के बयान का डाकिया बनना नहीं है। पत्रकार का काम सवाल करना है, दावे को परखना है, तथ्य खंगालना है और उस बात का दूसरा पक्ष सामने लाना है जिसे कोई छिपाना चाहता हो।

सवाल पूछना बदतमीजी नहीं है।

सवाल पूछना पत्रकार का धर्म है।

और सवाल से बचने वाला व्यक्ति अगर नाराज होता है तो होने दीजिए। पत्रकारिता का काम किसी को खुश करना नहीं, जनता को सच के करीब ले जाना है।

आज सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि पत्रकार सवाल नहीं पूछ सकते।

संकट यह है कि कई जगह सवाल पूछने की आदत ही खत्म होती जा रही है।

क्यों?

क्या इसलिए कि सामने बैठा व्यक्ति बहुत प्रभावशाली है?

क्या इसलिए कि अगली बार बुलावा न आने का डर है?

क्या इसलिए कि विज्ञापन, संबंध या संस्थागत दबाव सवालों से बड़ा हो गया है?

या फिर इसलिए कि पत्रकारिता की जगह सिर्फ कंटेंट उत्पादन ने ले ली है?

इन सवालों के जवाब जितने असहज हैं, उतने ही जरूरी भी।

लोकतंत्र में सत्ता को सवाल पसंद आएं, यह जरूरी नहीं। लेकिन पत्रकार को सवाल पूछने चाहिए—यही जरूरी है।

क्योंकि जिस प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल नहीं होते, वहां संवाद नहीं होता।

और जिस पत्रकारिता में प्रतिप्रश्न नहीं होते, वहां खबर नहीं—सिर्फ प्रचार का प्रसारण होता है।

इसलिए पत्रकार साथियों से बस इतनी गुजारिश है—

अगली प्रेस कॉन्फ्रेंस में नोटबुक जरूर लेकर जाइए, कैमरा जरूर ले जाइए, रिकॉर्डर जरूर चलाइए…

लेकिन सबसे पहले अपने सवाल लेकर जाइए।

क्योंकि जिस दिन पत्रकार ने सवाल पूछना छोड़ दिया, उस दिन प्रेस कार्ड तो उसके पास रहेगा—

लेकिन पत्रकारिता नहीं।

डाॅ. अनुराग सक्सेना

वरिष्ठ पत्रकार एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया (रजि.)

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