एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में एक संपादकीय वाले पेज पर लेख प्रकाशित हुआ, शीर्षक था ‘आर्थिक मुश्किलों के बीच’। इस लेख में ‘आंकलन किया गया कि बढ़ती महंगाई, टूटते रुपये और गिरते शेयर के बीच वैश्विक आर्थिक स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट में मौजूदा वित्त वर्ष में भारत को सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के तौर पर रेखांकित किया जाना बहुत ही हैरान भले ही न करता हो लेकिन यह हमारी खुशफहमी का कारण भी नहीं होना चाहिए।’ ऐसी बहुत सी रिपोर्टस् अखबारों में एवं सोशल मीडिया में चलती रहती है। साथ ही सोशल मीडिया पर एक अन्य बात बहुत ही मुखर तरीके से फैल रही है कि पिछले 7 सालों में केन्द्र सरकार ने इतना कर्ज ले लिया है कि आज देश कंगाली के कगार पर आ खड़ा हुआ है। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन का वह स्टेटमेंट भी सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिल जाता है, जिसमें उनका कहना है कि केन्द्र सरकार की गलत आर्थिक नीतिओं के देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। इन सभी बातों में तुलना करते हैं पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश व अन्य ऐसे देशों से, जो विदेशों से, विशेषकर अमेरिका एवं चीन से कर्ज लेकर आवश्यक सेवाएं निःशुल्क बांटना प्रारम्भ कर दिया और सत्तासीन हो गये, एक समय के बाद उसके आर्थिक संकट तो सामने आने ही थे, लेकिन मैं इस बात से अंशतः सहमत हो सकता हूं लेकिन इससे पूर्व मैं एक प्रश्न उन विद्वानों से उन्हीं विद्वानों से करना चाहता हूं कि जो कह रहे हैं कि भारत ने इतना कर्ज ले लिया है देश आर्थिक संकट से गुजर रहा है। क्योंकि यह बात रखनी चाहिए कि 1947 के बाद विभिन्न वैश्विक वित्तीय प्रबन्धक संस्थानों से कितना कर्ज लिया गया, इसका आंकड़ा किसी को याद नहीं है, तो क्या वह लिया कर्ज का देश पर कोई प्रभाव नहीं डाल रहा?
लेकिन एक प्रश्न उन विद्वानों से पूछना चाहता हूं कि 1947 के बाद से क्या हमारा देश की अर्थव्यवस्था देश का आर्थिक रुप से सुदृढ़ बनाने वाली नीति का अनुसरण किया गया अथवा वोट बैंक के लालच में सब्ससिडी का दौर चलता रहा और आमद के नाम पर कोई ठोस नीति नहीं!! क्योंकि बहुत ही साधारण और गंवारों वाला का नियम है कि एक परिवार में कमाने वाला एक हो लेकिन खाने वाले 10 हो तो क्या वह परिवार खुशहाल होगा? आज हमारे देश में यही हो रहा है। हमारे देश के शासन में रहने वाली सत्ताओं ने आम जनता को यह सीखा दिया है कि उनको देश के प्रति कोई कत्र्तव्य नहीं बल्कि अधिकार है। उल्लेखनीय यह भी है कि नीति आयोग की वेबसाइट पर बांटे जाने वाली सक्ससिडी का आंकड़ा का अध्ययन करने ज्ञात होता है कि लगभग 8.45 लाख करोड़ की सब्ससिडी गरीबों व अन्य पिछड़े वर्ग के नाम पर बांटी जा रही है। ध्यान में रखना होगा कि 1947 में हमारे देश की आबादी लगभग 33 करोड़ थी, लेकिन आज यह संख्या 136 करोड़ पहंुच चुकी है। 1947 में आयकरदाताओं की संख्या देश में कितनी थी, एक शहर में एक या दो और बड़े शहरों में दो अंकों में और उस समय आयकर अधिकारी का प्रभार एक जनपद में न होकर बल्कि अनेक शहरों का होता था लेकिन आज एक बड़े जनपद में एक नहीं बल्कि अनेक प्रमुख आयकर आयुक्त एवं आयकर आयुक्त बैठने लगे हैं। लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न है कि कुल आबादी ;136 करोड़द्ध की तुलना में कितने लोग आयकर का भुगतान कर रहे हैं। यह प्रश्न उस वर्ष में है जब देश 75वें वर्ष जब अमृत महोत्सव मना रहा है।
अक्सर मैं अपने साथियों से चर्चा करता हूं कि तब उनका कहना होता है कि हम टैक्स दे रहे हैं, मेरा प्रश्न होता है कैसे, तो उनका कहना होता है कि कुछ भी खरीदते हैं तो उसके माध्यम से टैक्स का भुगतान करते हैं तो मेरा उन लोगों से प्रश्न है कि कितना टैक्स दे रहे हैं और कितने लोग ईमानदारी से टैक्स दे रहे हैं। साथ ही उन लोगों से भी प्रश्न है जो कहते हैं कि देश की आर्थिक स्थिति विस्फोट के कगार है तो उन लोगों से भी है जो सरकार से बिजली, पानी, बस सेवा, फ्री अनाज, फ्री गैस सिलेण्डर, फ्री सिंचाई, फ्री खाद आदि सभी सेवाएं फ्री में प्राप्त करने की आशा करते हैं कि क्या फ्री की सुविधाएं देश की आर्थिक सेहत नहीं बिगाड़ रहे?
हम पिछले दिनों हरिद्वार में आयोजित बैठक में पधारे उत्तराखंड के वित्त मंत्री एवं कमिश्नर, राज्य कर से प्रश्न किया था कि 136 करोड़ की आबादी के साक्षेप में मात्र 1.50 करोड़ पंजीकृत व्यापारियों की संख्या और ;अपै्रल 22द्ध का प्राप्त जीएसटी राजस्व संग्रह 1.66 लाख करोड़ की संख्या से संतुष्ट हैं? इसी प्रकार आयकर रिटर्न दाखिल होने वाली संख्या तो 9 करोड़ से अधिक है लेकिन आयकर जमा करने वालों की संख्या मात्र 1.50 करोड़ के आसपास ही है। अब बताये कि 136 करोड़ आबादी के साक्षेप में आयकर देने वालों की संख्या कितने प्रतिशत हुई। अब बात करें देश की आर्थिक नीति की तो देश की आर्थिक नीति नियन्ताओं का नीति बनाने का आधार कितना नया है और कितना पुराना। जैसे कानून की बात करें तो जीएसटी का 2017 का नया कानून बताते हैं कि उसका आधार 1944 का है। इसी प्रकार आर्थिक नीति में हेरफेर करते रहना, रेपोरेट का बढ़ाना या घटाना, किस इन्डैक्स पर कि पुराने आर्थिक आधार पर!
अब प्रश्न उन लोगों से पुनः कि उन लोगों को देश की आर्थिक सेहत की बहुत चिंता है तो वह देश का आर्थिक आधार को मजबूत बनाने में क्या योगदान दे रहे हैं। अभी विश्व मौद्रिक बैंक की रिपोर्ट भी मुद्दा बनेगी। तो तुलना करते हैं अमेरिका, रुस, नीदरलैंड, स्विटलरलैंड, स्पैन आदि देशों से, तुलना यह भी करनी चाहिए कि अमेरिका की आबादी 33 करोड़, रुस की आबादी 17 करोड़, और नीदरलैंड, स्विटलरलैंड आदि देशों की आबादी 1 करोड़ से अधिकतम 5 करोड़।
हमारे विचार से हमारे देश में विद्वानों की संख्या तो बहुत अधिक हो गयी है लेकिन जिम्मेदारी निभाते हुए बाते करने वालों की संख्या नगण्य ही कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। लेकिन आवश्यकता है कि देश में फ्री का बांटने वाली राजनीतिक दलों पर रोक लगानी होगी।
साथ ही केन्द्र व राज्य सरकारों पुराने कानूनों में आमूल-चूल परिवर्तन करें और देश में ‘टैक्सेशन संेस’ (टैक्स वातावरण) पैदा हेतु दंडात्मक एवं उत्पीड़ात्मक नियम कानून खत्म करें और प्रोत्साहन और प्रेरणात्मक कानून बनाये।
– पराग सिंहल
