5 वर्षो बाद जरूरत है जीएसटी अधिनियम के समीक्षा की

1 जुलाई, 2017 को लागू हुआ वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) भारत के सबसे महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष कर सुधारों में महत्व का प्रयास कहा लाना चाहिए। जीएसटी को देश की आर्थिक सुधार का प्रतीक इसलिए कहा जाना चाहिए क्योंकि पूर्व में देश मंे 17 केंद्रीय और राज्य करों को एक एकीकृत ढांचे से प्रतिस्थापित करके, इसने ‘कर पर कर’ के दुष्चक्र को समाप्त कर दिया और ‘एक निर्बाध राष्ट्रीय बाजार’ का निर्माण किया साथ ही देश के कर अनुपालन तथा व्यावसायिक औपचारिकता को महत्वपूर्ण रुप से प्रोत्साहित किया गया। जीएसटी प्रणाली का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्रमिक रुप से करों को समाप्त करने का मुख्य प्रभाव पड़ा। जीएसटी लागू होने के पूर्व उत्पादन और वितरण के हर चरण में करों के ऊपर कर लगाए जाते थे, परन्तु इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) व्यवस्था के लागू होने से यह दोहरा कराधान समाप्त हो गया है, जिससे कुल उत्पादन लागत कम हो गई है और उपभोक्ताओं को अधिक स्थिर मूल्य प्राप्त होने लगे।
जीएसटी के माध्यम से एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार और लाॅजिस्टिक्स दक्षता से राज्य स्तरीय सीमा चैकियों और चुंगी को डिजिटल ई-वे बिल प्रणाली से प्रतिस्थापित करते हुए जीएसटी ने पूरे देश में पारगमन समय और लाॅजिस्टिक्स लागत में भारी कमी की है। इस सुधारात्मक निर्णय ने भारत को छोटे, बिखरे राज्य बाजारों के जोड़ने के बजाय एक एकीकृत आर्थिक संघ के रुप में कार्य करने में सक्षम बनाया है। देश के संघीय राजकोषीय गतिशीलता राज्यों को साथ लाने के लिए, केंद्र ने क्षतिपूर्ति उपकर व्यवस्था शुरु की गई। इस परिवर्तन के प्रयास ने राज्यों की वित्तीय स्वतंत्रता को निश्चित रुप से बदलाव ला दिया।
कर अनुपालन और औपचारिकीकरण में वृद्धि के रुप में वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (जीएसटीएन) के माध्यम से डिजिटल फाइलिंग प्रक्रियाओं और चालान मिलान ने कर आधार को व्यापक बनाने का प्रयास किया गया, जिसका परिणाम मिला कि सरकार के लिए लगातार, रिकाॅर्ड तोड़ राजस्व संग्रह हुआ है। इन सभी पहलुओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि देश में व्यापार करने में आसानी हुई। लेकिन जीएसटी लागू होने के 9 वर्षो के बाद भी वर्तमान में चल रही चुनौतियां लघु एवं मध्यम उद्यमों पर अनुपालन का बोझ के रुप में देखते हुए अनुभव किया जा रहा है। देश मंे स्थापित बड़े उद्यमों के लिए सरलीकरण के बावजूद, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) और असंगठित व्यापारियों को शुरु में डिजिटल बुनियादी ढांचे के अनुकूल होने में महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़़ रहा है। जीएसटी अधिनियम एवं नियमावली में बार-बार किये जा रहे संशोधन और जटिल फाइलिंग प्रणालियां छोटे व्यवसायों पर अनुपालन लागत का मानसिक एवं आर्थिक बोझ डाल रही है। निःसंदेह सरकार ने माल और सेवाकर प्रणाली के माध्यम से देश को ‘एक देश-एक प्रणाली’ का स्वरुप प्रदान करने का कहीं हद तक सफल प्रयास किया। क्योंकि पूर्ववर्ती कर प्रणालियों में प्रत्येक राज्य अपने कानूनों का बनाते हुए लागू करता था लेकिन जीएसटी में एक देश-एक अधिनियम में बदलाव ला दिया।

लेकिन हमने लिखने में संकोच नहीं है कि जीएसटी अधिनियम को बनाने में जिस अधिनियम का आधार लिया गया उससे इस एकीकृत प्रयास में छेद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इस कानून में दो मालिकों को बना दिया गया और दोनों मालिकों को अधिनियम की धारा-5 में स्वतंत्र एवं व्यापक अधिकार प्रदान कर दिये गये उधर धारा-6 में दोनों ही विभागों को प्राधिकार देना भी कर प्रणाली की एकीकृत भावना को प्रभावित करता है। जबकि होना यह चाहिए था कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाती कि दोनों के कार्य आपस में टकराव न होन पाये। परिणाम सामने आने लगा है कि दोनों मालिकों के व्यापक अधिकारों कुप्रभाव पंजीकृत व्यक्ति पर पड़़ने लगा। सरकार को विचार इस धरातल पर करना चाहिए क्योंकि राज्य कर विभाग और केन्द्रीय कर विभाग के कार्यप्रणाली में बड़ा अंतर है।

इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) व्यवस्था के लागू होने से यह दोहरा कराधान समाप्त हो गया है परन्तु अब ऐसे बहुत से वाद सामने आने लगे है कि पंजीकृत व्यक्ति को अपनी आईटीसी को प्राप्त करने में स्वयं को दोषमुक्त साबित करना पड़़ रहा है। क्योंकि व्यापारिक लेनदेन में ऐसी बहुत सी परिस्थिति पैदा हो जाती है कि ईमानदारी से व्यापार करने पर भी व्यावहारिक तौर पर ईमानदारी शक के घेरे में आने लगती है।

इस प्रकार से पात्र आईटीसी का लाभ मिलने के स्थान पर एक्ट सिरदर्द दिखने लगा है। देखा यहां तक जाने लगा है कि जिसने कर का भुगतान करते हुए माल की खरीदी की है उसको पुनः कर की मांग को पूरा करना पड़़ रहा है या विवादों का सामना करना पड़ रहा है।

व्यापार शुरु करने के 2 या 3 वर्ष बाद भौतिक निरिक्षण में सामान का न मिलने पर पंजीयन निरस्त करते हुए अर्थदंड आरोपित करना और विक्रेता द्वारा आर-1 या टैक्स न जमा करने पर खरीदार पर आईटीसी को रिवर्स करने का आर्थिक भार पड़ना स्वतंत्र व्यापारिक गतिविधि को रोकना जैसा है।
इस कर प्रणाली में आरसीएम का कठिन प्रावधान है कि अपंजीकृत खरीद पर पंजीकृत व्यक्ति को दोहरा कर का बोझ पड़़ने पर उसका प्रयास यही होता है कि अपंजीकृत खरीद पर दोहरा के बोझ से कैसे निपटा जाये, क्योंकि आर-1 में अपंजीकृत खरीद पर जमा जीएसटी आर-2 में कहीं भी दिखायी नहीं देता, तो आईटीसी का लाभ नहीं मिलता।
एक्ट में अपंजीकृत खरीद पर पुनः कर की देयता की व्यवस्था बहुत ही जटिल और कष्टदायी साबित होने लगी है। पूर्ववर्ती कर कानूनों में एकपक्षीय वादों का निपटारा स्थानीय स्तर पर हो जाता था परन्तु जीएसटी एक्ट में वादों को एकपक्षीय करने का अधिकार सक्षम अधिकारी को तो प्रदान किये हैं परन्तु उसका निपटारा करने की व्यवस्था अधिनियम में कहीं भी नहीं दिया गया है। एक्ट में की गई ऐसी व्यवस्थाएं अनुचित एवं प्राकृतिक न्याय की सीमा को अतिक्रमित करता है।

अब सरकार को यह भी देखना चाहिए कि देश में व्यापार करने वाले स्वयं को पंजीकृत व्यक्ति के रुप में व्यापार करने में रुचि नहीं ले पा रहे हैं, क्या यह असफलता की श्रेणी में नहीं आता है!! इसका प्रभाव पंजीकृत व्यक्ति पर पड़़ता है।

ऐसे बहुत से बिन्दु है जिन पर सरकार को पुनः विचार करना चाहिए। बार-बार संशोधन को रोकते हुए बल्कि निर्णय यह लेना चाहिए कि प्रत्येक पांच वर्ष में कर कानूनों की समीक्षा किये जाने का प्रावधान कर दिया जाये, लेकिन इस समीक्षा में दोनों पक्षों का भागीदारी बराबर की होनी चाहिए। साथ ही सरकार का प्रयास यह भी होना चाहिए कि देश की जीडीपी को बढ़ाने में कर कानूनों की सरलता और तरलता होनी चाहिए ताकि कोई भी पक्ष स्वयं को पीड़ित होने का अनुभव न कर सके।
— आगरा से पराग सिंहल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *