आंवला, बरेली। अवैध अस्पतालों के खिलाफ स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अफसरों की कार्रवाई दिखावे की तालाबंदी तक सिमट गई है। उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं कराया गया और इसका ही नतीजा है कि पहले फरीदपुर के मर्सी अस्पताल में नवजात की मौत हो गई और अब अलीगंज के ब्रह्मदेव अस्पताल में जच्चा-बच्चा की जान चली गई। चौंकाने वाली बात है कि दोनों ही अस्पतालों को घटना से पहले विभाग के नोडल अधिकारी ने चेक किया था, फिर उनको कौन सा कागज देखकर माफी दी गई, इसकी जांच होनी चाहिए। वही अलीगंज क्षेत्र के गांव जोगीठेर के द्वारिका प्रसाद की गर्भवती पत्नी रिंकी को प्रसव पीड़ा होने पर गैनी के ब्रह्मदेव अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यह वही अस्पताल है जहां कुछ दिन पहले ही नोडल अधिकारी ने चेकिंग के दौरान कमी पकड़ी थी। लेकिन न तो अस्पताल बंद कराया गया और न ही मुकदमा हुआ। अस्पताल में जच्चा-बच्चा की मौत हो गई। हंगामा हुआ, मामले ने तूल पकड़ा तो सोमवार को नोडल अधिकारी डॉ. सुचिता गंगवार ने अस्पताल की दोबारा जांच की और सील कर दिया। सवाल उठ रहा है कि आखिर पहले हुई जांच के बाद कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इसी तरह फरीदपुर में मर्सी अस्पताल में नवजात की मौत के बाद वहां के एमओआईसी डॉ. अनुराग गौतम ने जांच की। रिपोर्ट में अस्पताल में खामी मिली, पंजीकरण नोडल अधिकारी डॉ. लईक अंसारी ने मौके पर निरीक्षण किया। मर्सी अस्पताल को नोटिस जारी किया, सील कर दिया। लेकिन बिना ठोस कार्रवाई के अब मर्सी अस्पताल फिर से शुरू हो गया है। नोटिस का तो नियम ही नहीं , सीधे दर्ज होना चाहिए मुकदमा : झोलाछाप अस्पताल, क्लीनिक से सांठगांठ करने के लिए नोटिस को अधिकारियों ने बहाना बना लिया है। जब अस्पताल, पैथलाजी पंजीकृत ही नहीं है, उसका सीएमओ कार्यालय में रजिस्ट्रेशन ही नहीं है, तो भला संचालक कौन सा कागज लेकर कार्यालय आएगा। यह बात अफसर न समझते हों, यह गले नहीं उतरता। नियमानुसार तो अवैध अस्पताल, बिना डिग्री चिकित्सा कार्य कर रहे झोलाछाप के खिलाफ तत्काल संबंधित थाने में मुकदमा दर्ज होना चाहिए। लेकिन बीते कई माह में विभाग की तरफ से एक भी मुकदमा दर्ज नहीं कराया गया।।
— बरेली से कपिल यादव
