जल तो जीवन है जलापूर्ति के लिए फिर से जद्दोजहद की बारी

*धूलभरी आंधीयों और प्रचंड लू में पानी के लिए सफर करने को मजबूर ग्रामीण

बाड़मेर/राजस्थान- भारत पाकिस्तानी सीमा पर स्थित सरहदी ईलाका बाड़मेर, बरसों पहले जहां गाय के शुद्ध देशी घी से भी महगे पानी की एक एक बूंद की कीमत अहम मानी गई वहां आजादी के छ: आठ दशक से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी पानी की कीमत और आवश्यक्ता जस की तस बनी हुई हैं। बरसों पहले भी हमारे बडे़ बुजुर्गों द्वारा कुओं बावड़ियों, नाडिया आदी से पानी सहेज कर लाना पड़ता था। वहीं आज भी ग्रामीण ईलाकों के हर गांव ग्वाड में हजारों जिन्दगीयां रोजाना तपती हुईं धूप में पानी के लिए जद्दोजहद करती हुई नजर आती हैं। हालांकि बाड़मेर जिले में दोनों और से नहरी पानी आने के सुखद समाचार ने एकबारगी पूरे बाड़मेर जिले की अवाम के चेहरों पर खुशी ला दी थी, मगर व्यवस्थाओं के चक्रव्यूह और गावों में दिनोदिन बढती ओछी राजनीति के चलते पानी को सूखे गले को तर करने में फिर देर करनी शुरू कर दी हैं।

इंसान तो इंसान, मूक पशु पक्षी और वनस्पति भी पानी के अभाव में त्राही त्राही करता मिल जाता हैं। कौसो दूर तक चलकर पानी जुटाने की मशकत को देखकर यही लगेगा कि आज भी ग्रामीण अंचल में गाय के शुद्ध देशी घी जमीन पर गिर जाए तो माथे पर शिकन न आएगी, मगर पानी अगर जमीन पर गिर गया तो पूरे परिवार पर मानों आफत आ जाएगी। यही वजह है कि पानी की तलाश के साथ साथ पानी को सहेज कर रखना और पानी का जरूरत अनुरूप उपयोग करना ग्रामीण जीवन में बहूत मायने रखता हैं।

बात अगर सच कहू तो, सरकारी पाइपलाइनों में नहरी पाईप का पानी अगर सरकारी दफतरो से होकर न गुजरे तो जिले का एक भी नागरिक ऐसा न होगा जो यह कहे कि हमारे यहाँ पर पानी नहीं हैं। मगर सिस्टम में फसकर नहरी पानी अपने दायरे में बंध कर लगभग अपाहिज सा बन गया हैं। जीवन अमृत होते हुए भी यह नहरी पानी हजारों प्यासे कंठ को तर नहीं कर पाता हैं। इंसान तो फिर भी छोटा मोटा आंदोलन की राह पर चलकर कुछ पानी का जुगाड़ कर लेता हैं मगर मूक पशु पक्षी,,, यह तो पानी की तलाश में चलते चलते आखिर प्यास से तड़पते बेजुबान परिन्दे दम तोड़ देते हैं।

इन सब पर भारी पड़ता हैं व्यवस्थाओं का वह जवाब जिसमें कहा जाता हैं कि हमारे बाड़मेर जिले में नहरी पानी जिले के अंतिम छोर तक पहूंच रहा हैं, और प्यास से कोई भी बेहाल नहीं हैं। ऐसे हालात में पानी की किल्लत से दम तोड़ती जिन्दगिया और जिले के दौनो सिरे से आने वाला नहरी पानी आपस में विरोधाभाषी बन कर उभर रहा हैं।

सच यह भी हैं कि, आज भी जिले के नेता अपने अपने ईलाकों में पानी की जलापूर्ति व्यवस्था करवाने के लिए जिला प्रशासन की बैठको में जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारीयों से अक्सर भिड़ते हुए नजर आते हैं। वहीं सरकारी तंत्र इस तथ्य को स्वीकार तक नहीं करता कि हमारे बाड़मेर जिले में कहीं पर पानी की कमी हैं भी। जबकि वास्तविकता यह हैं कि सरहदी ईलाका हो या सुदूर ग्रामीण ओर शहरी क्षेत्रों की राहे,,, जहां से भी आप वातानुकूलित वाहनों से गुजरोगे आपको जीर्ण शीर्ण जलदाय विभाग द्वारा निर्मित पानी की होदीया, जगह जगह पर लीक होती पानी की लाईने, सूखे हुए पानी के होद, रित चूके जलाशय,,, सब मुह बाहें फैलाए सिर्फ पानी की किल्लत की कहानी बयां करते हुए आपको नजर आऐंगे। और साथ ही नजर आएगें हजारों हजार ग्रामीण जो पानी की दो बूंद की उम्मीद में घंटों तक इंतजार और मशकत कर पानी जुटाने में लगे रहते हैं।

राज्य का मुखिया अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे हो या फिर कोई और उनके द्वारा जल स्वावलम्बन अभियान हालांकि जलस्थलों को मशीनरी से खोदकर पानी इक्टठा करने की बेहतरीन योजना हैं किन्तु जिनके हलक पानी के लिए तरस रहे हैं उनके लिए कुआ खोदकर पानी निकालने की बातें जरूर हास्यास्पद ही लगती हैं। वर्तमान में लोगों को पानी की आवश्यक्ता हैं, पानी हर घर तक तय समयानुसार पहूंचे इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों सहित जिला प्रशासन स्तर पर बेहतर प्रयास होने चाहिए। क्योंकि धनाढ्य परिवार तो अपने धनबल पर कहीं से भी नहरी पानी की टंकीयां खरीद कर भी मंगवा लेते हैं किन्तु गरीब…. गरीब परिवारों के मुखिया किसे अपना दुखड़ा सुनाएंगे सरकार …..।

– राजस्थान से राजूचारण

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