महात्मा ईश्वरदासजी की पावन धरा और चारण समाज का आजीवन ऋणी : मेवा राम जैन

बाड़मेर/राजस्थान- पिछले दिनों बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बाड़मेर जिला मुख्यालय पर महात्मा ईशरदास जी के पैनोरमा की घोषणा कर न केवल चारण समाज अपितु सम्पूर्ण समाजों की भावनाओं की कद्र की है महात्मा ईशरदास जी के दिव्य ग्रंथ हरीरस आज भी हमारे समाज में सकारात्मक राह दिखा रहे है, भाद्रेश गाँव के महात्मा ईश्वरदासजी की पावन धरा और चारण समाज का आजीवन ऋणी हूं यहाँ के लोगों द्वारा मुझे अपने परिवार का सदस्य मानकर मेरा मान सम्मान और मेरा मनोबल हमेशा बढाया है l

आज सुबह राज्य गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष और बाड़मेर विधायक मेवा राम जैन के कार्यालय में भादरेश,सुरा ,बाड़मेर शहर सहित आसपास के गाँवो से चारण समाज के सैकड़ों विद्वानों सहित तमाम समाजों के लोगो ने साफा और माल्यार्पण करने के साथ ही पैनोरमा स्वीकृति के लिए
मिठाई बाटकर खुशी प्रकट की एवं जन जन के चहेते मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का आभार प्रकट किया गया l इस अवसर पर विधायक मेवा राम जैन का साफा और फूलों की माला पहनाकर सम्मान किया गया l

ईश्वर दास जी के बारे में साहित्यकारों की नज़र में –
चारण महात्मा ईसरदास रोहड़िया (वि. सं. 1515 से वि. सं. 1622) को राजस्थान और गुजरात में भक्त कवि के रूप में आदरणीय स्थान प्राप्त है। उनकी साहित्यिक संपदा गुजरात और राजस्थान की संयुक्त धरोहर है। आचार्य बदरीप्रसाद साकरिया यथार्थ रूप में कहते हैं कि- हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में जो स्थान गोस्वामी तुलसीदास और कृष्णभक्त कवि सूरदास का है वही स्थान गुजरात, राजस्थान, सौराष्ट्र, सिन्ध, धाट और थरपारकर में भक्तवर ईसरदास का है। भक्त कवि ईसरदास ने उम्रभर भक्ति के विरल स्वानुभवों और धर्मग्रंथों से प्राप्त ज्ञान का सुंदर समन्वय अपने साहित्य में प्रस्तुत किया है। मगर यहाँ ईसरदास रोहड़िया के जीवन में हुए चमत्कारों, पुरस्कारों और शिलालेखों के संदर्भ में ही बातें करनी अभीष्ट है। भक्त कवि ईसरदास रोहड़िया के दीर्घ जीवन में अनेक घटनाएँ एवं चमत्कार हुए और उन्हीं चमत्कारिक घटनाओं के साथ उनका जीवन जुड़ गया है। हम कह सकते हैं कि ये चमत्कार उनके जीवन में सहज ही प्रगट हुए हैं।

लोकप्रसिद्धि या बदइरादे से या बाहरी दिखावे के लिये ये चमत्कार बताये गये हों ऐसा नहीं है। वस्तुतः भक्त कवि ईसरदास के हृदय में स्थाई रूप से निहित अनुकंपा, त्याग की भावना से प्रेरित हो दीन-दुखियों की सहायता करने की वृत्ति के कारण ही उनके जीवन में घटित कुछ सहज घटनाएं तत्कालीन परिवेशानुसार लोकमानस में चमत्कार के रूप में पैठ गई। भक्तों में मिलनेवाली अलौकिक शक्ति के बारे में कालिदास महाराज ने एक संदर्भ में कहा है कि-‘भक्ति की चरमसीमा पर पहुँचे व्यक्ति भक्त के हृदय को द्रवीभूत कर अपने आराध्य में लीन हो जाते हैं। इससे आराध्य इष्ट की सारी शक्तियाँ उसमें आ बसती है” परमात्मा पर अटूट श्रद्धा और अमिट विशास ही भक्त की आत्मशक्ति को बढ़ाता हैं। ईसरदास के जीवन में बनी चमत्कारिक घटनाएँ उनकी परमात्मा के प्रति अटूट श्रद्धा के ही कारण हैं। इस श्रद्धा के बल पर ही ईसरदास अनेक बाधाओं को पार कर ईसरा सो परमैशरा’ वाली उक्ति प्राप्त कर सके हैं। यहाँ भक्त कवि ईसरदास के जीवन में घटी चमत्कारिक घटनाओं का बहुत सारे इतिहासकारों और विद्वान कवियों ने अपनी कविताओं में सार प्रस्तुत किया गया है l

इस अवसर पर तन सिंह, रेवन्त दान, नैणी दान, तेज दान,
अभय करण, नीम्ब दान, जयपाल, महिपाल सिंह रोहडिया , आलाराम प्रजापत, नरेंद्र सिंह, नेमा राम, हनुमंत दान, बलवन्त सिंह, नरपत सिंह , खेत दान, मनोहर सिंह, हिगलाज दान, प्रवीण सिंह, कपिल, हरसुख, तेज दान, हाजी रहीम खान शीपा, नरपत दान ,मगा राम ,पदमा राम, हैमा राम, कपील दान,हिंगलाज दान, भवानी दान,गिरधर दान, भूर दान,मुरार दान,टीला राम,घेवर सिंह ,दिनु खान,मुला राम,कार्तिकेय सिंह, परिक्षित सिंह चारण सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

– राजस्थान से राजूचारण

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