अधबीच :रोपवे के झूलों से निकलती आत्म स्वीकृतियां

शशांक दुबे

रात भले रंगीन थी, लेकिन सुबह बड़ी संगीन थी। पहाड़ी पर गिरने को आतुर रोपवे के झूलों में वे लटके हुए थे। जीतने झूले, उतनी आवाज़ें। अब तो सब मरेंगे',अरे मेरे तो दो छोटे-छोटे बच्चे हैं’, निकलते ही छींक हुई थी',अभी तो एक ही कहानी हिट हुई थी’,अरे मैं तो अपना ड्राअर खुला ही छोड़ आया...'। तभी एक झूले से कोई अनुभवी चिल्लाया, ‘सब तुम्हारे कर्मों का खेला है। अरे पापियो, मरने से पहले अपने-अपने गुनाहों का प्रायश्चित तो कर लो। हो सकता है, इससे ऊपर बैठा सर्वशक्तिमान हम पर रहम दिखा दे। अब तो आत्मस्वीकृतियाँ कर लो। और हाँ, कहते भी जाओ, सुनते भी जाओ और ऊपर वाले से दुआ भी करते जाओ। क्या पता हम बच ही जाएं?’ शुरुआत एक बैंकर ने की, ‘दुनिया में तीन तरह के कंजूस होते हैं। पहले दर्जे का कंजूस वह जो कुछ खर्च ही ना करे, दूसरा कंजूस वह जो कुछ खर्च करने के बाद लगातार आपसे यह उम्मीद करता रहे कि आप भी उतना ही खर्च करें, तीसरा वह जिस पर कोई व्यक्ति कुछ खर्च कर दे तो जब तक वह खुद इतनी राशि खर्च ना कर दे, उसे चैन नहीं मिलता। मैं इसी केटेगरी का कंजूस हूँ’। इतने में टेलीफोन विभाग से दस साल पहले रिटायर्ड एक लाइनमैन की आत्मा जागी, ‘मैंने अपने कई रिश्तेदारों की दुबई बात करवाई थी’। बड़ी देर से मौन एक नौकरीपेशा ने अपनी असफलताएं जाहिर करते हुए बतलाया,जब भी किसी ने मुझे फटा नोट टिकाया है, मैंने उसे बगैर प्रतिरोध के स्वीकार किया है, मगर जब उस नोट को कहीं ओर टिकाने की बारी आई है तो मैंने हमेशा ही मात खाई है।’
`वाह क्या बात है।‘, एक पार्ट टाइम कवि ने फरमाया, आपकी इस स्वीकृति में गज़ब का कवित्व है। भई बधाई लें। जिंदा बचे, तो अपना संकलन आपको जरुर भेंट करुंगा। भई वाह… अरे अरे आप लोग ताली मत बजाइये, दुआएं कीजिए’।
इस बीच एक बाबू बोल पड़े, ‘मैं बिजली के मीटर में मैग्नेटिक रील फंसा दिया करता था’।
मैग्नेट की बात चलते ही श्यामू चक्की वाले को कुछ याद आया, ‘अब क्या बताऊं, मैं तो तराजू के बाट वाले पलड़े पर नीचे से चुम्बक चिपकाता रहा हूँ।’
अब बारी एक हलवाई की थी, ‘मैं तो रबड़ी में ब्लाटिंग पेपर और मावे में आलू मिलाता रहा।’
एक अफसर के मुँह से आह निकली, ‘मैं तो अफसर बना ही जाति के नकली सर्टिफिकेट के बल पर हूँ।’
किसान ने भी अपने पाप गिनाने चालू किये, ‘पिछले साल किसान आंदोलन में मैं डब्ल्यूटी गया था।’
कूली ने बीड़ी का ठुड्डा पानी में सिराते हुए कहा, ‘मैं कामायनी एक्सप्रेस के अनरिजव्र्ड डिब्बे की एक बर्थ पर हमेशा अपना साफा पटक देता था।’
जगह रोकने की बात पर एक कस्बे के सिंगल थियेटर टाकीज के गेटकीपर को भी कुछ याद आ गया, ‘मैंने बीस साल पहले गदर में दो-दो लोगों को फ्री घुसवाया।’

रेल्वे टी स्टाल के कांट्रेक्टर कहने लगे, ‘मैं बिसलेरी की बोतल में प्याऊ का पानी भरता था।’
इससे पहले कि वे अपनी बात पूरी करते, किसी ने गुहार लगाई, ‘बधाई हो। बचाव दल आ गया है।’ इतना सुनते ही सारे लोग ‘पाप-पुण्य’ का हिसाब छोड़, सरकार से मिलने वाले मुआवजे की रकम का अनुमान लगाने में व्यस्त हो गए।

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