बैंक में वर्षों से जमा 2 करोड़ से ज्यादा की रकम का कैसे हुआ कथित बंदरबांट!
चार्जशीटेड प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा ने जारी किया था विवादित पत्र, चेयरमैन अली जैदी और मुतवल्ली जमीर रज़ा पर भी गंभीर आरोप
शासनादेश की अनदेखी कर खाते संचालन कराने का मामला गरमाया, मुख्यमंत्री से लेकर डीजीपी तक शिकायत
लखनऊ/बरेली। उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में आ गया है। बरेली स्थित वक्फ नवाब मोहम्मद हुसैन खां की बैंक में वर्षों से जमा करोड़ों रुपये की रकम के कथित बंदरबांट का मामला अब तेजी से तूल पकड़ रहा है। आरोप है कि बोर्ड के चार्जशीटेड प्रशासनिक अधिकारी सैयद हसन रज़ा रिजवी, चेयरमैन अली जैदी और विवादित मुतवल्ली जमीर रज़ा ने मिलकर नियम-कानूनों को दरकिनार करते हुए वक्फ की करीब 2 करोड़ रुपये से अधिक की रकम के संचालन और निकासी में गंभीर अनियमितताएं कीं।
मामले की शिकायत मुख्यमंत्री, डीजीपी, वक्फ मंत्री, प्रमुख सचिव अल्पसंख्यक कल्याण, जिलाधिकारी, पुलिस कमिश्नर समेत कई उच्च अधिकारियों तक पहुंच चुकी है। शिकायत सामने आने के बाद वक्फ बोर्ड और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा हुआ है।
पूरा मामला वक्फ नवाब मोहम्मद हुसैन खां, पंजीयन संख्या 1-1111, 1112, 1115, बरेली से जुड़ा है। आरोप है कि इस वक्फ के खाते में वर्षों से अमानत के तौर पर जमा भारी रकम को एक सुनियोजित तरीके से नियंत्रण में लेकर बाद में कथित रूप से उसका बंदरबांट कर लिया गया।
इस पूरे विवाद की जड़ बना 29 दिसंबर 2023 को जारी वह पत्र, जिसे शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के प्रशासनिक अधिकारी सैयद हसन रज़ा रिजवी द्वारा भारतीय स्टेट बैंक, बरेली को भेजा गया था। इस पत्र में मुतवल्ली जमीर रज़ा को वक्फ के बैंक खाते के संचालन का अधिकार दिए जाने की बात कही गई थी। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारी को ऐसा पत्र जारी करने का कोई वैधानिक अधिकार ही नहीं था।
दरअसल, उत्तर प्रदेश शासन द्वारा पूर्व में जारी स्पष्ट शासनादेश में साफ कहा गया था कि वक्फ बोर्ड के आदेशों, संकल्पों और वित्तीय मामलों से संबंधित आदेश जारी करने तथा उन पर हस्ताक्षर करने का अधिकार केवल मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) को होगा। शासन ने यह भी स्पष्ट किया था कि अध्यक्ष, सदस्य, सहायक सचिव, प्रशासनिक अधिकारी या अन्य कोई पदाधिकारी ऐसे आदेश जारी नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, शासनादेश में ऐसे अनधिकृत आदेश जारी करने वालों के खिलाफ एफआईआर और विभागीय कार्रवाई तक सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे।
इसके बावजूद प्रशासनिक अधिकारी द्वारा सीधे बैंक को निर्देशात्मक पत्र भेजे जाने से पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि यह पूरा खेल करोड़ों रुपये की रकम पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए सुनियोजित तरीके से किया गया।
मामला तब और ज्यादा गंभीर हो गया जब यह आरोप सामने आया कि चार्जशीटेड प्रशासनिक अधिकारी हसन रज़ा का कार्यकाल समाप्त हो चुका था, लेकिन शासन, बोर्ड और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना ही उसका कार्यकाल एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया। इस कथित अवैध सेवा विस्तार की शिकायत मुख्यमंत्री, वक्फ मंत्री और प्रमुख सचिव तक पहुंची हुई है, जिस पर जांच चलने की बात कही जा रही है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जब किसी अधिकारी पर पहले से आरोप और चार्जशीट लंबित थी, तब उसे सेवा विस्तार देना अपने आप में कई बड़े सवाल खड़े करता है। आरोप यह भी है कि इसी विवादित कार्यकाल के दौरान कई संवेदनशील फाइलों और वित्तीय मामलों में नियमों की अनदेखी की गई।
वक्फ मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई गई तो मामला केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें पद के दुरुपयोग, सरकारी आदेशों की अवहेलना, आपराधिक षड्यंत्र, वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग और सरकारी व्यवस्था को गुमराह करने जैसी गंभीर बातें भी सामने आ सकती हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शासन और जांच एजेंसियां इस कथित करोड़ों रुपये के खेल की निष्पक्ष जांच कराएंगी, या मामला राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव में दबकर रह जाएगा। वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर उठे इस विवाद ने शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
— बरेली से तकी रज़ा
