पीलीभीत। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को बीसलपुर क्षेत्र के गांव नूरानपुर में रामकथा के समापन समारोह को सिर्फ धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसके मंच से क्षेत्रीय जनता से सीधा संवाद भी साधा। अपने संबोधन में उन्होंने स्थानीय जनप्रतिनिधियों, संतों और आयोजन समिति के पदाधिकारियों का नाम लेकर उन्हें महत्व दिया तो राम मंदिर, धार्मिक आस्था, विकास, सुरक्षा और सरकारी योजनाओं के सहारे आमजन से जुड़ने का प्रयास किया। ग्रामीण क्षेत्र में उमड़ी भीड़ को देखकर मुख्यमंत्री ने आयोजन की सफलता पर प्रसन्नता जताई और इसे संतों के महाकुंभ जैसा बताया। इस मौके पर उन्होंने गोरक्षपीठ से जुड़े शिव मंदिर में पूजा अर्चना की। ब्रह्मलीन महंत योगी शांतिनाथ के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। सीएम ने कहा कि पूर्व में जब बरेली प्रवास के दौरान कार्यक्रम की जानकारी दी गई थी तो उन्होंने सवाल उठाया था कि गांव में इतना बड़ा आयोजन सफल हो पाएगा या नहीं। लेकिन हजारों श्रद्धालुओं और बड़ी संख्या में संतों की मौजूदगी देखकर उन्होंने आयोजन समिति और क्षेत्रीय जनता की सराहना की। इस तरह उन्होंने ग्रामीणों की सहभागिता को सीधे सम्मान देकर उनसे भावनात्मक जुड़ाव बनाया। सीएम योगी ने कहा कि कुछ संत अपनी साधना से पहचान बनाते हैं तो कुछ अपने निराले व्यक्तित्व से लोगों के दिलों में जगह बना लेते हैं। नूरानपुर आश्रम के ब्रह्मलीन महंत योगी शांतिनाथ ऐसे ही संत थे, जिनका जीवन फक्कड़पन, बेपरवाही और अपनी ही मस्ती में गुजर गया। न आश्रम के निर्माण की चिंता, न व्यवस्थाओं को संवारने की फिक्र और न ही दुनिया की किसी अपेक्षा का बोझ। मुख्यमंत्री ने बताया कि वह वर्ष 1995-96 से शांतिनाथ को जानते थे। उनसे अक्सर कहते थे कि आश्रम में कुछ निर्माण करा लो, व्यवस्था को आगे बढ़ाओ, लेकिन वह अपनी ही धुन में रहते थे। उन्हें निर्माण के लिए धन भी दिया जाता था, मगर वह उसे भी खर्च नहीं कर पाते थे। योगी ने मुस्कराते हुए कहा कि शांतिनाथ बड़े फक्कड़ साधु थे। मन हुआ तो कुछ ग्रहण कर लिया, नहीं तो वैसे ही चलते रहे। उनके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं था। शांतिनाथ से अपने पुराने संबंधों को याद करते हुए मुख्यमंत्री ने एक मार्मिक प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने बताया कि वह उनसे कभी-कभी मजाक में पूछते थे कि भाई, मरोगे तो क्या करोगे? इस पर शांतिनाथ कहते थे कि मुझे कौन पूछने वाला है। योगी ने कहा कि जीवन की नश्वरता सभी को स्वीकार करनी पड़ती है। एक दिन उनका शरीर शांत हुआ और उन्हें इसी स्थान पर समाधि दी गई। बाद में महंत हनुमान नाथ ने उनकी समाधि का निर्माण कराया।।
पीलीभीत से कपिल यादव
