कलयुगी भगवान ने लापरवाही की सभी हदें कर दी पार : नारायण बारेठ

निजी अस्पताल द्वारा मृत बेटे के जेरे ईलाज कागज़ात देने में जानबूझकर देरी…

बाड़मेर/राजस्थान- राज्य सूचना आयोग ने बीकानेर के मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी को निर्देश दिया है कि एक पिता प्राइवेट हॉस्पिटल से अपने पुत्र के जेरे इलाज के दस्तावेज मांग रहे त्रिलोक चंद को संबंधित सूचनाओं को उपलब्ध करवाए। आयोग ने इसमें देरी पर नाराजगी प्रकट की और कहा लोक सूचना अधिकारी के रूप में सरकार द्वारा नियुक्त मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी जिला मुख्यालयों पर डाक पहुचाने वाले पोस्टमैन नहीं है।

इस मामले में सुनवाई करते हुए सूचना आयुक्त नारायण बारेठ ने चिकित्सा महकमे के प्रतिनिधि से कहा कि त्रिलोक चंद के सूचना का अधिकार आवेदन कागज पर लिखी हुई सिर्फ एक इबारत नहीं है। इसमें एक पिता के आहत अंतर्मन का आर्तनाद भी है। इससे पहले त्रिलोक चंद ने सूचना आयोग से कहा वे नवंबर 2019 से अपने पुत्र अजय के इलाज के कागजात मांग रहे है। उनका कहना था कि उपचार के दौरान उनके जवान पुत्र की मृत्यु हो गई। लेकिन निजी हॉस्पिटल बेड हेड टिकट [रोगी शैया टिकट ] देने से जानबूझकर इंकार कर रहा है।

सुनवाई के दौरान चिकित्सा विभाग के प्रतिनिधि ने अपना पक्ष रखा और कहा वे कई बार उस निजी हॉस्पिटल को पत्र भेज चुके है। इस पर सूचना आयुक्त ने अप्रसन्नता व्यक्त की और कहा की राज्य सरकार द्वारा जिला मुख्यालयों पर नियुक्त मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को सरकार द्वारा उपलब्ध कानूनी उपायों के तहत अपनी शक्तियों का आवश्यकतानुसार इस्तेमाल करना चाहिए था। आयोग ने मेडिकल कौंसिल के नियमों का हवाला दिया और कहा इस बाबत मेडिकल कौंसिल एक्ट की पालना की जानी चाहिए। आयोग ने अपने आदेश में कौंसिल के नियमों का उल्लेख किया और कहा ऐसे मामलों में तीन दिन या फिर बहत्तर घंटे में सूचना दी जानी चाहिए थी।

सूचना आयोग ने अपने आदेश में बॉम्बे हाई कोर्ट और केरला हाई कोर्ट के फैसलों की नजीर को रेखांकित किया और मेडिकल प्रशासन को सूचना मुहैया कराने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान सूचना आयुक्त बारेठ ने कहा इस मामले का कानूनी पहलु है तो एक पिता का मानवीय पक्ष भी है। यह विडम्बना है कि किसी व्यक्ति को अपने दिवंगत पुत्र के उपचार संबंधी दस्तावेजों के लिए जयपुर राज्य सूचना आयोग तक आना पड़े।

आयोग ने अफ़सोस के साथ कहा कि दुःख तो दुःख है। लेकिन भारतीय समाज में एक पिता के कंधे पुत्र का शव उठने के दुःख की गहनता को सबसे बड़ा दुःख माना जाता है। आयोग ने कहा यह खेदजनक है कि एक पिता को अपने दिवंगत पुत्र के इलाज के दस्तावेज हासिल करने के लिए दो साल से अधिक समय तक इंतजार करना पड़ा। आयोग ने मेडिकल प्रशासन से साफ़ कहा है कि इसमें अब कोई कोताही नहीं बरती जानी चाहिए।

– राजस्थान से राजूचारण

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