* पश्चिम के सागर तट पर स्थित सोमनाथ और पूर्व की आध्यात्मिक राजधानी काशी, दोनों मिलकर भारत की अनंत चेतना का आलोक प्रसारित कर रहे हैं- आनंदीबेन पटेल
* काशी और सोमनाथ भारतीय सभ्यता के दो अमर स्वर हैं, एक ने समुद्र की लहरों के मध्य आस्था का दीप जलाए रखा, तो दूसरे ने गंगा की अविरल धारा के साथ ज्ञान, मोक्ष और अध्यात्म का संदेश संपूर्ण विश्व को दिया- राज्यपाल,उ.प्र.
* सनातन केवल मंदिरों की दीवारों में ही नही, अपितु भारत की चेतना में बसता है-योगी आदित्यनाथ”
* भारत की चेतना, आत्मा को अजर, अमर मानकर चलती है, यही भारत की अजरता, अमरता का शास्वत शंखनाद भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक विरासत झलकती है-मुख्यमंत्री
* राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री ने किए बाबा विश्वनाथ के दर्शन, कहा-सनातन संस्कृति को पराजित नहीं किया जा सकता
वाराणसी- राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री ने श्री काशी विश्वनाथ धाम में सोमनाथ की प्रतिकृति पार्थिव ज्योतिर्लिंग की स्थापना कर किया जलाभिषेक और पूजन वाराणसी। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक दिवसीय दौरे पर सोमवार को वाराणसी पहुंचे। पुलिस लाइन हेलीपैड से उनका काफिला काशी विश्वनाथ मंदिर पहुंचा। दोनों लोगों ने बाबा विश्वनाथ के दरबार में विधि-विधान से दर्शन-पूजन किया और प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की। मंदिर में त्रयंबकेश्वर सभागार में प्रमुख कार्यक्रम का आयोजन होना है। स्कूल की छात्राओं ने शंखनाद और मंत्रोच्चार के साथ उनका स्वागत किया। तत्पश्चात् राज्यपाल आनंदीबेन पटेल एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के त्रयंबकेश्वर हॉल में आयोजित श्री सोमनाथ संकल्प पूजन कार्यक्रम में शामिल हुए। यहां बीएचयू के छात्रों द्वारा तैयार सोमनाथ की प्रतिकृति पार्थिव ज्योतिर्लिंग की स्थापना कर जलाभिषेक और पूजन किया। इस अवसर पर लोगों को संबोधित करते हुए उत्तर की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” हमें उस दिव्य सोमनाथ मंदिर की हजार वर्षों की अविचलित यात्रा का स्मरण कराता है, जिसने अनेक आक्रमणों, संघर्षों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी आस्था, ऊर्जा और अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रखा। सोमनाथ राष्ट्र के स्वाभिमान का ज्योति-स्तंभ है और आज, उसी गौरवगाथा की श्रृंखला में बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर की पावन धरती पर यह ज्योतिर्लिंग कार्यक्रम आयोजित हो रहा है। यह संयोग नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की अद्भुत आध्यात्मिक एकता का प्रतीक है, जहाँ पश्चिम के सागर तट पर स्थित सोमनाथ और पूर्व की आध्यात्मिक राजधानी काशी, दोनों मिलकर भारत की अनंत चेतना का आलोक प्रसारित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि काशी और सोमनाथ भारतीय सभ्यता के दो अमर स्वर हैं। एक ने समुद्र की लहरों के मध्य आस्था का दीप जलाए रखा, तो दूसरे ने गंगा की अविरल धारा के साथ ज्ञान, मोक्ष और अध्यात्म का संदेश संपूर्ण विश्व को दिया। जब सोमनाथ की घंटियाँ और काशी की आरती एक साथ गूंजती हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो संपूर्ण भारत अपनी सनातन आत्मा का उद्घोष कर रहा हो। अरब सागर की लहरों के मध्य, गुजरात के प्रभास पाटन में अवस्थित सोमनाथ मंदिर भारत की आत्मा का अमर स्वर है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रतिष्ठित यह पावन धाम युगों से हमारी आस्था, संस्कृति और स्वाभिमान का दिव्य दीप बनकर आलोकित होता रहा है। इतिहास ने अनेक बार इस मंदिर की दीवारों को तोड़ने का प्रयास किया, आक्रमणों ने इसके शिखरों को झुकाने का दुस्साहस किया, किन्तु हर बार सोमनाथ पुनः उसी तेज, उसी दिव्यता और उसी अदम्य आत्मविश्वास के साथ खड़ा हुआ। मानो वह संपूर्ण मानवता से कह रहा हो—
“धर्म का प्रकाश कभी बुझता नहीं, सत्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता।” यह मंदिर हमें सिखाता है कि विनाश की आयु क्षणभंगुर होती है, पर सृजन सनातन होता है। आक्रमणकारी तलवारें समय के गर्त में विलीन हो जाती हैं, किन्तु संस्कृति की चेतना शाश्वत रहती है।
यह हमारे लिए गौरव की बात है कि भारत सरकार द्वारा “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व–अटूट आस्था के हजार वर्ष” का यह विराट स्मरणोत्सव 11 जनवरी 2026 से 11 जनवरी 2027 तक देशभर में विभिन्न आयोजनों, यात्राओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से मनाया जा रहा है। यह भारत की आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक गौरव और सनातन परंपरा के पुनर्जागरण का महायज्ञ है।
हजार वर्षों की इस यात्रा में सोमनाथ मंदिर ने जितने आघात सहे, उतनी ही बार वह पुनः उसी दिव्य तेज के साथ खड़ा हुआ। उसकी प्रत्येक पुनर्स्थापना मानो यह उद्घोष करती रही कि भारत की आत्मा को न तो पराजित किया जा सकता है और न ही उसकी संस्कृति को समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आज से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व, सन 1026 में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। उसने पत्थरों को तोड़ा, शिखरों को गिराया, किन्तु वह उस आस्था को नहीं तोड़ सका, जो करोड़ों भारतीयों के हृदय में दीपशिखा की भांति प्रज्वलित थी।
समय बीता, परन्तु सोमनाथ की चेतना कभी नहीं बुझी। 12वीं शताब्दी में राजा कुमारपाल ने उसका पुनर्निर्माण कराया। फिर 13वीं शताब्दी के अंत में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण हुए, किन्तु सोमनाथ पुनः उठा। 14वीं शताब्दी के आरंभ में जूनागढ़ के राजाओं ने उसकी प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की। मुजफ्फर खान के आक्रमण आए, पर श्रद्धा अडिग रही। 15वीं शताब्दी में सुल्तान महमूद बेगड़ा ने मंदिर को मस्जिद में परिवर्तित करने का प्रयास किया, किन्तु इतिहास ने फिर देखा कि आस्था तलवारों से बड़ी होती है। और फिर वह कालखंड आया, जब औरंगजेब ने सोमनाथ को अपवित्र करने और उसकी पहचान मिटाने का प्रयास किया। किन्तु भारत की सांस्कृतिक चेतना ने फिर उत्तर दिया। मालवा की धर्मनिष्ठ महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने सोमनाथ को पुनः स्थापित कर यह सिद्ध कर दिया कि सनातन संस्कृति को मिटाना असंभव है। यह पर्व हमें अपने गौरवशाली अतीत से ऊर्जा लेकर भविष्य के भारत के निर्माण का संकल्प देता है— ऐसा भारत, जो अपनी जड़ों से जुड़ा हो, अपनी संस्कृति पर गर्व करता हो और विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश देता हो।
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसकी आर्थिक समृद्धि, भौतिक संसाधनों या तकनीकी प्रगति में नहीं होती, बल्कि उसकी सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक स्मृति और आध्यात्मिक आधार में निहित होती है। जब कोई समाज अपनी आस्था से जुड़ा रहता है, अपनी जड़ों को पहचानता है और अपनी विरासत के प्रति सम्मान एवं सजगता बनाए रखता है, तभी उसकी सभ्यता दीर्घकाल तक जीवंत और सशक्त बनी रहती है। आस्था केवल पूजा-पद्धति का विषय नहीं है, वह समाज की सामूहिक चेतना का आधार होती है। हमारी परंपराएँ, तीर्थ, स्मारक, लोककलाएँ, भाषाएँ और सांस्कृतिक मूल्य—ये सभी हमारी सभ्यता की वे जड़ें हैं, जिनसे हमारी पहचान निर्मित होती है। यदि जड़ें मजबूत हों, तो समय के कितने ही तूफान क्यों न आएँ, वृक्ष अडिग रहता है। ठीक उसी प्रकार, जो समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहता है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व और आत्मविश्वास बनाए रखता है। भारत की सभ्यता इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। हजारों वर्षों के इतिहास में अनेक आक्रमण, राजनीतिक परिवर्तन और सामाजिक चुनौतियाँ आईं, किन्तु भारत की सांस्कृतिक धारा कभी अवरुद्ध नहीं हुई। इसका कारण यही था कि यहाँ के समाज ने अपनी विरासत को केवल स्मृति के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य के रूप में संरक्षित किया। हमारे मंदिर, आश्रम, पर्व, साहित्य और आध्यात्मिक परंपराएँ केवल अतीत की धरोहर नहीं हैं; वे वर्तमान को दिशा देने वाली जीवंत शक्तियाँ हैं। विरासत के प्रति सजगता हमें यह बोध कराती है कि आधुनिकता और परंपरा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। जो समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, वह अंततः दिशाहीन हो जाता है; परन्तु जो समाज अपनी सांस्कृतिक चेतना को संजोकर आगे बढ़ता है, वही स्थायी विकास और नैतिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है। सोमनाथ का इतिहास पराजय का इतिहास नहीं है। यह इतिहास पुनर्जन्म का है। यह इतिहास उस अदम्य संकल्प का है, जिसमें हर विध्वंस के बाद एक नया निर्माण खड़ा हुआ। आततायी आते रहे, समय के अंधकार में विलीन होते रहे; किन्तु सोमनाथ हर युग में पुनः उसी तेज, उसी श्रद्धा और उसी गौरव के साथ खड़ा होता रहा। सोमनाथ मानो स्वयं यह उद्घोष करता है—“तलवारें सभ्यताओं को घायल कर सकती हैं, किन्तु संस्कृति की आत्मा को समाप्त नहीं कर सकतीं।” उन्होंने कहा कि जिस राष्ट्र की जड़ें अपनी संस्कृति में गहरी होती हैं, उसकी उड़ान भी उतनी ही ऊँची होती है। आज भारत उसी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है। सोमनाथ से लेकर काशी तक, केदारनाथ से लेकर महाकाल तक पूरा देश अपनी आध्यात्मिक धरोहरों को आधुनिक विकास के साथ जोड़ते हुए विश्व के समक्ष एक नए भारत की तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है।
यह नया भारत आत्मगौरव से भरा हुआ भारत है। यह नया भारत अपनी विरासत पर गर्व करने वाला भारत है। और यह नया भारत विश्व को यह संदेश दे रहा है कि—“जो राष्ट्र अपनी संस्कृति को संजोता है, वही भविष्य का नेतृत्व करता है।” हमारी सभ्यता की सबसे बड़ी खूबी यह रही है कि उसने शक्ति को कभी अहंकार का हथियार नहीं बनाया। यहाँ विजय का अर्थ किसी को पराजित करना नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित करना रहा है। भारत की आत्मा ने हमेशा मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की बात की है। यही कारण है कि हमारी आस्था की राह हमें घृणा की तरफ नहीं ले जाती, बल्कि करुणा, सह-अस्तित्व और संवाद की ओर ले जाती है। भारत ने दुनिया को यह नहीं सिखाया कि दूसरों को हराकर कैसे जीता जाए। हमने यह सिखाया कि दिलों को जीतकर कैसे जिया जाए। हमारी परंपरा में “विजय” का अर्थ विनाश नहीं, विश्वास है। हमारे यहाँ राम हैं, जो युद्ध के बाद भी मर्यादा की बात करते हैं। बुद्ध हैं, जो करुणा का मार्ग दिखाते हैं। कबीर हैं, जो आदमी को आदमी से जोड़ते हैं। और गांधी हैं, जो बताते हैं कि सबसे बड़ी ताकत सत्य और अहिंसा में होती है।
इस अवसर पर मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सोमनाथ मंदिर और काशी विश्वनाथ धाम दोनों ही भारत के इतिहास और सनातन संस्कृति की अदम्य शक्ति के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति पर आक्रमण तो हो सकते हैं, लेकिन उसे कभी पराजित नहीं किया जा सकता। विनाश क्षणिक होता है, जबकि सृजन शाश्वत होता है। उन्होंने कहा कि करीब एक हजार वर्ष पहले विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर कई बार हमला किया। विदेशी आक्रांताओं ने सोमनाथ मंदिर पर 17 बार आक्रमण कर उसके वैभव को नष्ट करने का प्रयास किया। उन्हें भ्रम था कि मंदिर की मूर्तियों को खंडित कर और उसका वैभव लूटकर भारत की आत्मा को समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह केवल सोमनाथ मंदिर तक सीमित नहीं था, बल्कि देश के हजारों धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों को निशाना बनाया गया। इसमें काशी विश्वनाथ धाम भी शामिल रहा। बावजूद इसके भारत की सनातन परंपरा और सांस्कृतिक चेतना आज भी पूरी शक्ति के साथ जीवित है।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मार्गदर्शन व प्रेरणा देशवासियों को मिल रहा है। प्रधानमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी प्रेरणा से हम सब एक भारत, श्रेष्ठ भारत की संकल्पना को साकार होते देख रहे हैं। जिसका साकार रूप सौराष्ट्र में भगवान सोमनाथ महादेव के भव्य मंदिर के पुनर्प्रतिष्ठा, सुंदरीकरण और कार्यक्रम के साथ, काशी में काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल में महालोक की स्थापना कार्यक्रम, अयोध्या धाम में श्रीरामजन्मभूमि के निर्माण का कार्यक्रम अनेक सनातन परंपरा से जुड़े हुए पवित्र तीर्थस्थल अपने वैभव के साथ विकास की नई यात्रा को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विशेष रूप से जोर देते हुए कहा कि हम सब जानते हैं मो.गोरी से लेकर मुगलों तक, कई विदेशी आतताइयों ने हमारी आध्यात्मिक, सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करने का प्रयास किया। औरंगजेब ने बाबा विश्वनाथ के प्राचीन मंदिर को ध्वस्त कर एक गुलामी का ढांचा भी यहां खड़ा किया, लेकिन वो भारत की आत्मा को तोड़ नही पाए। वो नही समझ पाए, सनातन केवल मंदिरों की दीवारों में ही नही, अपितु भारत की चेतना में बसता है, और भारत की चेतना, आत्मा को अजर, अमर मानकर चलती है, यही भारत की अजरता, अमरता का शास्वत शंखनाद भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक विरासत में हम सबके सामने झलकती है। जिन्होंने सनातन को मिटाने का प्रयास किया, आज वह स्वयं मिट्टी में मिल चुके हैं। आज उन आक्रांताओ का नाम लेने वाला कोई नही है, लेकिन काशी विश्वनाथ धाम हो या सोमनाथ महादेव का मंदिर ये दोनों भारत के स्वाभिमान की गाथा को आगे बढ़ा रहे हैं। दुर्भाग्य से आज बहुत ऐसी शक्तियां है, जो भारत की इस आत्म गौरव के प्रतीक स्वाभिमान के प्रतीक, इन आध्यात्मिक व सांस्कृतिक स्थलों को स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ते हुए देखना नही चाहते।सभी लोग जानते हैं कि कौन लोग थे, जो सोमनाथ महादेव मंदिर के पुनर्प्रतिष्ठा कार्यक्रम में बाधक थे, ये वही लोग थे जिन लोगों ने कालांतर में श्रीराम मंदिर के निर्माण में और इस समस्या का समाधान न हो, इसमे भी उन्होंने बारम्बार बाधाएं खड़े करने का प्रयास किया। एक अवसर था, जब स्वतंत्र भारत इन कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकता था। लेकिन भारत के इस आत्म गौरव को पुनर्प्रतिष्ठा प्रदान करने की सोच का अभाव था।
इससे पूर्व राज्यपाल आनंदीबेन पटेल एवं मुख्यमंत्री ने आदित्यनाथ सहित अतिथियों का स्वागत पूर्व मंत्री एवं विधायक डॉ नीलकंठ तिवारी ने किया। इस अवसर पर आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम की भी प्रस्तुति हुई
कार्यक्रम में मंत्री अनिल राजभर, मंत्री रविन्द्र जायसवाल, मंत्री दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’, मंत्री हंसराज विश्वकर्मा, जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम मौर्या, महापौर अशोक कुमार तिवारी, एमएलसी धर्मेंद्र राय, पूर्व मंत्री एवं विधायक डॉ नीलकंठ तिवारी, विधायक सौरभ श्रीवास्तव, विधायक डॉ अवधेश सिंह, विधायक टी राम सहित मंडलायुक्त एस. राजलिंगम, जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार के अलावा अन्य लोग प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
