डिजिटल युग से आगे जेनरेटिव और एजेंटिक एआई का नया दौर : मुकेश मथराणी

राजस्थान/बाड़मेर- ऊर्जा क्षेत्र में तकनीक का असर अब सीधे नतीजों के रूप में दिखाई देने लगा है। तेल और गैस उद्योग अब डिजिटल तकनीक से आगे बढ़कर जेनरेटिव और एजेंटिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नए दौर में प्रवेश कर रहा है। इन तकनीकों के उपयोग से ऊर्जा खपत में लगभग पन्द्रह से बीस प्रतिशत तक की बचत दर्ज की जा रही है।

गौरतलब है कि तेल और गैस उद्योग, जो लंबे समय तक भारी मशीनरी और पारंपरिक प्रक्रियाओं पर निर्भर रहा है, अब बदलते समय के साथ तेजी से डिजिटल तकनीक से आगे बढ़कर जेनरेटिव और एजेंटिक एआई की ओर अग्रसर हो रहा है। देश के प्रमुख निजी तेल एवं गैस उत्पादकों में शामिल वेदांता ऑयल एंड गैस – केयर्न अपने पूरे संचालन में डिजिटल तकनीक को गहराई से लागू कर रहा है। कंपनी का उद्देश्य लागत कम करना, उत्पादन बढ़ाना और कामकाज को अधिक तेज और प्रभावी बनाना है। कंपनी में तकनीक का उपयोग अब एक नए चरण में पहुंच चुका है, जहां जेनरेटिव और एजेंटिक एआई का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है।

कंपनी का इन-हाउस प्लेटफॉर्म आई केयर्न अब कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण टूल बन गया है। इसकी मदद से वेल कंप्लीशन रिपोर्ट, फील्ड डेवलपमेंट प्लान और प्रोक्योरमेंट कॉन्टेक्टस जैसे बड़े तकनीकी दस्तावेजों से कुछ ही सेकंड में जरूरी जानकारी प्राप्त हो रही है। पहले जिन कार्यों में घंटों लगते थे, वे अब मिनटों में पूरे हो रहे हैं। इसके साथ ही एसएपी जूल जेसे टूल्स डेटा विश्लेषण को सरल बनाकर निर्णय लेने की प्रक्रिया को तेज कर रहे हैं।

इसी दिशा में कंपनी ने अपना पहला एजेंटिक एआई सिस्टम “केयर्न आईटी बड़ी” शुरू किया है। यह पारंपरिक चैटबॉट से अलग है क्योंकि यह केवल सवालों के जवाब नहीं देता, बल्कि समस्या को समझकर समाधान सुझाता है और आईटी सर्विस रिक्वेस्ट को आगे बढ़ाने में भी मदद करता है। इससे आईटी सपोर्ट सिस्टम पहले से अधिक तेज और स्वचालित हो गया है।

कंपनी अब इस तकनीक को अन्य क्षेत्रों में भी लागू करने की तैयारी कर रही है, खासकर प्रोक्योरमेंट में एआई एजेंट्स का इस्तेमाल बढ़ाया जाएगा। ये सिस्टम विक्रेताओं का मूल्यांकन करने, तकनीकी और व्यावसायिक विश्लेषण तैयार करने और खरीद प्रक्रिया को सरल बनाने में मदद करेंगे। इससे कर्मचारियों की भूमिका धीरे-धीरे डेटा तैयार करने से हटकर उसके विश्लेषण और निर्णय लेने तक सीमित होती जाएगी।

रेडियो फ्रीक्केंसी पहचान तकनीक के इस्तेमाल से इन्वेंटरी टेकिंग अब कुछ दिनों में पूरी हो रही है, जबकि पहले इसमें महीनों लगते थे। डिजिटल द्विन तकनीक के जरिए मशीनों और फील्ड ऑपरेशंस की रियल-टाइम निगरानी संभव हुई है, जिससे गैस की बर्बादी कम हुई है और उत्पादन दक्षता में सुधार आया है। करीब 10,000 यूनिट्स प्रति माह संभालने वाली लॉजिस्टिक्स प्रक्रिया भी अब पूरी तरह डिजिटल हो चुकी है, जिससे पारदर्शिता और पुनः उपयोग की क्षमता बढ़ी है। बढ़ती ऊर्जा खपत और कार्बन उत्सर्जन के बीच औद्योगिक क्षेत्रों में कूलिंग सिस्टम को लेकर एक बदलाव देखने को मिला है। अब पारंपरिक रखरखाव की जगह डेटा-आधारित प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस अपनाई जा रही है, जिससे ऊर्जा उपयोग पर बेहतर नियंत्रण संभव हुआ है।

रियल-टाइम निगरानी और दूरस्थ संचालन से लेस स्मार्ट एचवीएसी प्रणाली के जरिए उपकरणों की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। इससे संभावित खराबी का अंदाजा पहले ही लग जाता है और अनावश्यक ऊर्जा खपत रोकी जा रही है। तकनीकी आंकड़ों के अनुसार, इस प्रणाली से 15-20 प्रतिशत तक ऊर्जा की बचत हुई है, जबकि लगभग 134 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी दर्ज की गई है। सभी कूलिंग उपकरणों को एक केंद्रीकृत डिजिटल कंट्रोल सिस्टम से जोडने से जमीनी निरीक्षण पर निर्भरता घटी है और फैसले डेटा के आधार पर लिए जा रहे हैं।

— राजस्थान से राजूचारण

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