जीएसटी प्रावधान अनुच्छेद के अनुसार, परन्तु

भारत के संविधान के अनुच्छेद 246ए, अनुच्छेद 269ए और अनुच्छेद 279ए के वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) जैसे अप्रत्यक्ष कर अंतर्गत आते हैं। अप्रत्यक्ष कर को लागू करने के लिए प्रमुख संवैधानिक अनुच्छेद 246ए के तहत संसद और राज्य विधानमंडलों दोनों को वस्तुओं और सेवाओं पर कराधान (जीएसटी) संबंधी कानून बनाने की समवर्ती शक्ति प्रदान करता है। जबकि अनुच्छेद 269ए के तहत यह अंतर-राज्यीय व्यापार पर एकीकृत वस्तु एवं सेवा कर (आईजीएसटी) के लेवी और संग्रह से संबंधित है, जिसे संघ और राज्यों के बीच विभाजित किया जाता है। जबकि अनुच्छेद 279ए इसमें जीएसटी परिषद के गठन का प्रावधान दिया गया है, जो केंद्रीय वित्त मंत्री की अध्यक्षता में एक संयुक्त संघीय निकाय होगा और कर दरों और नियमों की सिफारिश करेगा। अध्ययन करे तो अनुच्छेद 265 की तो यह मूलभूत नियम बताता है कि कानून के अधिकार के बिना कोई भी कर (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष) लगाया या वसूला नहीं जा सकता है।

भारतीय संवैधानिक कानून में, प्राकृतिक न्याय को स्पष्ट रुप से एक संहिता के रुप में नामित नहीं किया गया है, लेकिन इसके मूल सिद्धांत अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 22 (गिरफ्तारी के खिलाफ संरक्षण) गहराई से निहित हैं।

प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांत नेमो जुडेक्स इन कौसा सुआ (nemo judex in dua) पूर्वाग्रह के विरु( नियम है, जिसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश के रुप में कार्य नहीं कर सकता। जबकि आडी अल्टरम पार्टेम (Ody Altaram Partem) निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार, जिसका अर्थ है कि कोई भी प्रतिकूल कार्रवाई करने से पहले दोनों पक्षों को सुना जाना चाहिए। प्राकृतिक न्याय में स्पष्ट आदेश का भी प्रावधान रखा गया है।
संविधान के अनुच्छेद 14 मध्यस्थता राज्य कार्रवाइयों के खिलाफ हड़तालें, भारत के संविधान के तहत निष्पक्ष और समान व्यवहार सुनिश्चित करता है।

जबकि अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत मेनका गांधी बनाम भारत संघ जैसे ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से इसका विस्तार किया गया है ताकि यह अनिवार्य किया जा सके कि किसी व्यक्ति को जीवन या स्वतंत्रता से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया न्यायसंगत, निष्पक्ष और तर्कसंगत होनी चाहिए। इसी प्रकार संविधान के अनुच्छेद 22 और 311 एवं 311ए की तो गिरफ्तार व्यक्तियों और सिविल सेवकों के लिए प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और बचाव के अधिकार को विशेष रुप से शामिल करता है।
अब बात करें कि माल एवं सेवाकर अधिनियम की जो कि संविधान के अनुच्छेद 246ए, अनुच्छेद 269ए और अनुच्छेद 279ए के अंतर्गत आते हैं।

अप्रत्यक्ष कर के लिए प्रमुख संवैधानिक अनुच्छेद 246ए के तहत शक्ति प्राप्त करते हुए संसद और राज्य विधानमंडलों दोनों को वस्तुओं और सेवाओं पर कराधान (जीएसटी) संबंधी कानून बनाया गया। लेकिन प्रश्न उठता है कि जीएसटी को बनाते समय संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 22 एवं 311ए के प्रावधानों का कितना ध्यान रखा गया!! क्योंकि जीएसटी क तहत बहुत से ऐसी धाराओं में इन अनुच्छेदों में रखे गये प्रावधानों की साक्षेप में विचार करना आवश्यक होता जा रहा है।
इस बात से आप सहमत ही होंगे कि कोई कानून हो उसमें दो पक्ष होते हैं ऐसे ही जीएसटी में भी दो पक्ष है पहला पक्ष पंजीकृत व्यक्ति तो दूसरा पक्ष एक्ट का पालन करना वाला विभाग! लेकिन मेरी समझ से एक्ट में कुछ धाराओं के प्रावधान पर कुछ प्रश्न उभर रहे हैं कि जीएसटी अधिनियम के प्रति कुछ प्रश्न उभर रहे हैं जैसे एक पक्षीय निर्णय के पश्चात पुनः वाद को खोलने का प्रावधान का न होना। अधिनियम में इस प्रकार के प्रावधान का अभाव देखा जा सकता है, क्योंकि 2017-18 से अभी तक सम्पन्न वादों के निस्तारण में यह देखा जा सकता है। किन्हीं भी कारणों के चलते अधिनियम की धारा-61 के तहत जारी नोटिसों के साक्षेप में पंजीकृत व्यक्ति द्वारा समय पर समुचित उत्तर न देना, तत्पश्चात विभागीय सक्षम प्राधिकारी द्वारा एक पक्षीय निर्धारण देना परन्तु किये गये एक पक्षीय निर्धारण के पश्चात पुनः सुनवाई का अवसर का प्रावधान न होना संविधान के अनुच्छेद 14, 311 एवं 311ए का स्पष्ट उल्लंघन प्रतीत होता है। जबकि पूर्ववर्ती कानून बिक्रीकर तत्पश्चात व्यापार कर में धारा-30 एवं वैट में धारा-32 के तहत रिओपन करने की व्यवस्था थी परन्तु जीएसटी में नहीं है। हां, जीएसटी में धारा-161 के तहत आदेश को संशोधन करने हेतु आनलाईन आवेदन देने की व्यवस्था दी है न कि रिओपन की।

इसी क्रम में अधिनियम की धारा-69 में पंजीकृत व्यक्ति की गिरफ्तारी का प्रावधान बहुत ही गैर-आवश्यक एवं अनुच्छेद 14 एवं 22 का स्पष्ट उल्लंघन दिखायी पड़़ता है। एक बात समझना जरुरी है कि जीएसटी एक अप्रत्यक्ष कर प्रणाली है इस प्रणाली के तहत पंजीकृत व्यक्ति उपभोक्ता से कर वसूलते हुए सरकारी कोष में जमा करता है परन्तु ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 22 में दिये गये अधिकारों की हनन की श्रेणी में आता है।
जीएसटी व्यवस्था के तहत बनाये गये जीएसटीएन पोर्टल में एक नहीं कमी दिखायी पड़ती है। जैसे किसी पंजीकृत व्यक्ति द्वारा कार्य करते समय कोई त्रुटि हो जाती है, तब उसका सुधार किसी भी स्तर पर नहीं हो पाता है। चाहे वह पोर्टल के दिये गये टैब हेल्प एवं टैक्सपेयर्स फैसिलिटी पर शिकायत दर्ज करवा दें टीम कोई निवारण करने में असमर्थ ही रहती है। जैसे रिफंड क्लैम करते समय पैन एवं बैंक खाता का मैच होना आवश्यक है परन्तु पंजीकृत व्यक्ति द्वारा पैन अथवा बैंक खाते के अपडेशन में गलत नंबर अंकित हो जाता है तब उसका सुधार हेतु कोई मजबूत तंत्र नहीं है, आप कितने ही टोकन जनरेट कर लें, कोई समाधान नहीं। इसी प्रकार डीआरसी -03 के माध्यम टैक्स जमा करते समय गलती से वर्ष का चुनाव में गलती हो जाती है और जब विभाग से नोटिस आने पर ज्ञात होता है तब तक समय निकल गया होता है उस गलती का कोई निदान नहीं और पंजीकृत व्यक्ति के स्तर पर उसको सुधार हेतु कोई सुविधा नहीं दी गई है।
इसी प्रकार एक्ट की धारा-107 के तहत दाखिल होने वाली अपील हेतु विवादित राशि का 10 प्रतिशत प्री-डिपोजिट जमा कराना बहुत अव्यवहारिक प्रावधान रखा गया है जबकि अन्य पूर्ववर्ती कर प्रणाली के अपील के साथ कोर्ट फीस न्यूनतम 100 अधिकतम 1000 रुपये थी, इसी प्रकार जीएसटी में अपीलेट प्राधिकारी को उपधारा (11) में प्रतिप्रेषित करने का अधिकार रोकता है जबकि पूर्ववर्ती कर प्रणाली में दाखिल अपील को रिमांड करने का अधिकार था न कि कर निर्धारण का।

अतः जीएसटी परिषद को वर्तमान अधिनियम में रखे गये प्रावधानों पर पुनः विचार करते हुए व्यापक सुधार और आसान बनाने की आवश्यक तो है ही, साथ एक जिम्मेदार तंत्र को बनाने की भी। सरकार को ऐसे अव्यवहारिक बिन्दुओं पर ध्यान देना चाहिए।

– आगरा से पराग सिंहल

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