बजट सत्र के दौरान केन्द्रीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीता रमण ने राज्यसभा में जानकारी दी कि जीएसटी परिषद तय फाॅमूलें पर काम करती है। राज्यसभा में पूछे गये प्रश्न और पूरक प्रश्न के जवाब देते हुए बताया था कि जीएसटी परिषद संघीय ढांचा है। यह राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के बीच बिना किसी भेदभाव के दिशा-निर्देशों के अनुरुप काम करती है।
एक अन्य प्रश्न में यह भी बताया कि राज्यों के 53,600 करोड़ अभी बाकी चल रहा है। जवाब देते हुए वित्त मंत्री ने कहा मौजूदा वित्त वर्ष (वर्ष 2021-22) के लिए राज्यों की जीएसटी के लिए 53,600 करोड़ रुपये जारी होने शेष है। वर्तमान वित्त वर्ष में राज्यों को इस मद में 96,576 करोड़ रुपये जारी हो चुका है।
साथियों, आपको ध्यान होगा कि जब देश में सरकारी स्तर पर जीएसटी अप्रत्यक्ष कर प्रणाली लागू होने की चर्चा चल रही थी, उस समय भी राज्यों को सबसे बड़ी चिन्ता यही थी कि जीएसटी लागू होने बाद राज्यों को अभी तक प्राप्त हो रहे राजस्व में घाटा होने पर उसकी भरपायी कैसे होगी? उसका रास्ता निकाला गया और जीएसटी के अतिरिक्त कुछ वस्तुओं पर चैथा ;नया करद्ध सेस लागू कर दिया गया, और व्यवस्था की गई कि होने वाले घाटे की भरपायी सेस से प्राप्त राजस्व से की जाएगी। याद होगा कि ‘जीएसटी’ को ‘एक देश-एक कर’ की संज्ञा दी गई लेकिन इस ‘एक देश-एक कर’ नीति के अन्तर्गत जीएसटी कर को 5 भागों में विभक्त कर दिया गया। जिसको सीजीएसटी, एसजीएसटी एवं आईजीएसटी में और केन्द्रशासित प्रदेशों पर एसजीएसटी के स्थान पर यूटीजीएसटी (यूनियन टेरिटरी जीएसटी) लागू कर दिया।
यह सभी जानते हैं कि एसजीएसटी के रुप में जाने वाला टैक्स विशु(रुप से राज्यों को प्राप्त होता है, इसके अतिरिक्त सीजीएसटी एवं आईजीएसटी के मद में प्राप्त होने वाले टैक्स में भी बड़ा भाग राज्यों को ही औसतीय आकड़ों के अनुसार बांटा जाता है, बात रही सेस की तो उसके बंटवारे में कितना भाग किस राज्य को बांटा जाएगा, इसका अधिकार केन्द्र सरकार के पास रहता है।
उल्लेखनीय यह भी रहा कि राज्यों को राजस्व के घाटे की भरपायी अगले 5 सालों तक करने की व्यवस्था रखी गई थी। अब जबकि जीएसटी लागू हुए 5 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं जिसमें प्रथम 3 वर्षो में शत-प्रतिशत, उसके बाद चैथे वर्ष में 75 प्रतिशत एवं पांचवे वर्ष में 50 प्रतिशत (जैसी जानकारी हमको है) कि राज्यों को भरपायी होने की चिन्ता सताने लगी है। अब सुनने में यह भी आ रहा है कि राज्यों की मांग है कि अगले कुछ वर्षो तक केन्द्र सरकार, राज्यों के घाटे की भरपायी करें। अतः सेस अभी लागू रहेगा, ऐसी आशा बंध रही है।
विचार करना ही होगा आंकलन पर कि वर्ष 2021-22 के दौरान कुल जीएसटी से कर संग्रह की तो वर्षभर में कुल 14,83,292 लाख करोड़ जीएसटी कर प्राप्त हुआ। इसमें सर्वाधिक जनवरी व मार्च की 1,40,000 लाख करोड़ को पार किया है। जबकि मई एवं जून का कर संग्रह 1 लाख करोड़ से कम रहा, क्योंकि अप्रैल एवं मई लाॅकडाउन से प्रभावित रहा। लेकिन प्राप्त हुआ जीएसटी का मासिक औसत 1,23,607 लाख करोड़ रुपये बैठ रहा है।
लेकिन यहां पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभर कर आ रहा है कि विशेषकर करदाताओं के मन में उभरने लगा हैं कि जब जीएसटी लागू किया गया था कि कहा गया था कि जीएसटी लागू होने के बाद देश को और राज्यों को टैक्स के रुप में भरपूर राजस्व प्राप्त होगा, बहुत बड़ी संख्या में जनता पंजीकृत करदाता के रुप में व्यापार करंेगे और सरकार को टैक्स भी जमा करंेगे। लेकिन 5 वर्षो के बाद प्रश्न उभरना स्वाभाविक है कि 5 वर्ष पूर्व जीएसटी प्रणाली लागू होने से पूर्व किये गये अध्ययन एवं आंकलन आधा -अधूरा था अथवा फेल हो गया?
अतः अब विचारणीय बिन्दु आवश्यक होता जा रहा है कि जीएसटी लागू होने के 5 वर्ष बाद केन्द्र व राज्य सरकारों के समक्ष विचार करना चाहिए कि क्या जीएसटी प्रणाली एक सफल प्रणाली कही जा सकती है? क्या जीएसटी प्रणाली, जिस स्वरुप में लागू की गई क्या वह सही तौर पर लागू हो पायी?
साथ ही केन्द्र व राज्य सरकारों को यह भी विचार करना चाहिए कि जीएसटी लागू होने के बाद विभाग बनाम करदाता के बीच कितने प्रतिशत अथवा संख्या में विवाद पैदा हुए अर्थात कानूनी प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। यह प्रश्न इसलिए भी उठा रहे हैं, क्योंकि आपको याद होगा कि जब श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी प्रधानमंत्री पद का दायित्व संभाला था तब राजस्व विभाग में लम्बित चल रहे विवादों को समाप्त करने के लिए सरकार द्वारा दो बार ‘विवाद से विश्वास स्कीम’ लागू करते हुए भारी संख्या में लम्बित संख्या विवादों का निपटारा कराने में सराहनीय भूमिका निभायी थी, साथ ही अपेक्षा से अधिक विवादास्पद राजस्व प्राप्त किया था। लेकिन हम समझते हैं कि पिछले 5 वर्षो में जीएसटी लागू होने के बाद पुनः बड़ी संख्या में राजस्व विभाग ;केन्द्रीय कर एवं राज्य करद्ध में बड़ी संख्या में विवाद विभिन्न न्यायालयों में विचार हेतु लम्बित हो चले हैं।
अतः अब केन्द्र व राज्य सरकारों के समक्ष कुछ प्रश्न रखना चाहते हैं कि
कि जीएसटी प्रणाली से देश की जनसंख्या के अनुपात में कितने लोग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रुप से जीएसटी से जुड़ पाये?
क्या जितनी आशा की जा रही थी कि 5 वर्षो के बाद राज्यों को पिछले वर्षो के मुकाबले भरपूर राजस्व प्राप्त होगा?
क्या वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान जीएसटी के माध्यम से प्राप्त कर संग्रह का उत्साहजनक माना जा सकता है?
यह प्रश्न तब उभर कर आ रहा है जबकि भारत, विश्व के दूसरी बड़ी जनसंख्या 136.30 करोड़ जनसंख्या वाला देश में न तो जीएसटी के अन्तर्गत पंजीकृत करदाताओं की संख्या और न ही प्राप्त राजस्व की राशि और न ही आयकरदाताओं की संख्या के साथ प्राप्त आयकर राशि को संतोषप्रद कहा जा सकता है!!! और जब सरकार को पूर्णरुप से राजस्व प्राप्त हो रहा है कि तो राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपायी क्यों?
– पराग सिंहल
