दुःखद परंतु कडवा सच आजकल की पत्रकारिता करने में : राजू चारण

पत्रकारिता कितना जोखिम भरा काम है, खुद पत्रकार हूँ ,इस लिए इस काम के दर्द से वाकिफ हूँ
पत्रकार खुद सबसे बड़ी खबर है,
लेकिन दुनिया उसके दर्द से बेखबर है,
वो किसी अख़बार की सुर्खी नहीं बनता,
वो दूसरों को सुर्ख़ियों में लाता है,
खुद भूखा रहता है,
भूखे के लिए खबर लिखता है,
खुद दुखों में रहता है,
हर दुखी को खबर में जगह देता है,
खुद प्यासा है,
हर प्यासे का सहारा है,
हर घटना पे सबसे पहले जाता है,
हर दंगे में खुद को घुटता पाता है,
खुद कोई बयां दे नहीं पाता,
दूसरों के बयानों को दिखाता है,
खुद सवाल उठाता है,
कइयों को कटघरे में लाता है,
और खुद को एक वक़्त पर ,
स्वयं कटघरे में खड़ा पाता है,
कोई बैंक कोई सरकार उसे लोन नहीं देती,
तमाम उम्र एक मोटर साइकिल के सहारे बिताता है,
बीवी बच्चों माँ बाप को कहीं घुमा नहीं पाता है,
मॉल के महंगे कपडे और रेस्टोरेंट में जाने से कतराता है,
किसी ब्रांडेड शर्ट और जीन्स के दामों के बराबर,
पूरे महीने की तयशुदा तनख्वाह पाता है,
पूरा दिन खबर की तलाश में बिताता है,
शाम को जब होता है परिवार संग बिताने का समय,
तो वो मुस्तैदी से दफ्तर पहुँच जाता है,
दिन भर तलाश की गयी खबर को,
और धारदार कलम से बनाता है,
मालिक के कहने पर खबर पर कैची भी चलानी पड़ती है,
उस समय पत्रकार का ज़मीर बहुत खबराता है,
अपनी खबर में असर पैदा करने के वास्ते,
कम शब्दों में अपनी बात कह जाता है,
दे के विज्ञापन का वास्ता उसकी खबर उड़ा दी जाती है,
इसका इलज़ाम खुद सम्बंधित पत्रकार उठाता है,
दो कमरों के घर में पूरे परिवार सहित उम्र बिता देता है,
वो पत्रकार जो सत्ता की दलाली से नहीं कमाता है,
अगर घर बड़ा और गाड़ी दिख जाती है उसके पास,
तो तुरंत पत्रकार की ईमानदारी पे शक चला जाता है,
उसे अधिकार नहीं की वो पहने महंगे कपडे, जूते और गहने,
उसे पड़ते हैं दुनिया और जनता के हर गम सहने,
किसी रसूखदार के खिलाफ लिखने पर कोई खबर,
मिल जाता है उसे एक नोटिस नौकरी से इस्तीफा देंने का,
जब मालिकान चाहते हैं निकाल के फेक देते हैं उसे,
ये कह कर की कंपनी का हो रहा है घाटा,
पत्रकार इस गम में हो जाता है घुट के आधा,
कई महीनों तक चाय बिस्कुट पर रहना सीख जाता है,
किसी बड़े मीडिया संस्थान का अगर न हो वो लेखक,
तो उसे पत्रकार मानने से इंकार कर दिया जाता है,
उसे उसी के घर में जलाकर मार दिया जाता है,
फिर शुरू हो जाती है एक सरकारी जांच,
तब तक केंद्र और राज्य सरकार की भारी भरकम योजनाओं के आगे,
शुरू हो जाता है योजनाओं का अथाह प्रचार प्रसार,
बैठ जाते है कुछ गणमान्य देने अपने विचार,
तब तक पत्रकार के साथ घटी वो घटना पुरानी हो जाती है,
तब तक किसी दूसरे पत्रकार की मौत की खबरें ताज़ी हो जाती है।

– राजस्थान से राजूचारण

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