लोकसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियों में रणनीति बननी शुरू, पहले जातिगत समीकरण, अब नए वोटरों पर भी नजर

बरेली। लोकसभा चुनाव मे राजनीतिक दलों ने अपनी जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना शुरू कर दिया है। बरेली मंडल की पांच सीटों की बात करें तो वर्तमान मे ये पांचो सीटें भाजपा के खाते मे हैं। इन सीटों पर कांग्रेस का विजयरथ डेढ़ दशक से थमा है। बरेली मे चुनाव भी अंतत: धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण पर केंद्रित होने की संभावनाओं के बावजूद दोनों तरफ से जातिगत समीकरण साधने पर जोर है। करीब 84 हजार उन नए वोटरों पर भी नजर है जिनमें 28 से ज्यादा युवा और 50 हजार से ज्यादा महिलाएं हैं। भाजपा और सपा की रणनीति में बसपा के संभावित प्रदर्शन का भी ख्याल रखा जा रहा है। लोकसभा चुनाव मे सभी पार्टियों के उम्मीदवार अपनी जीत के साथ ही नया इतिहास रचने की तैयारी में हैं। वैसे आजादी के बाद कांग्रेस के आधिपत्य वाली इन सभी सीटों को फतह करने में भाजपा को भी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है। हालांंकि, सबसे पहले जनसंघ ने बरेली लोकसभा सीट को अपने कब्जे मे किया था और लगातार नौ वर्ष तक विपक्ष को इस सीट से दूर रखा। इसके बाद अलग-अलग सीटों पर कांग्रेस और फिर सपा ने अपना कब्जा जमाया। जनता दल ने भी इन सीटों पर जीत दर्ज कर अपना वर्चस्व यहां कायम किया था। बरेली लोकसभा सीट पर आजादी के बाद कांग्रेस के सतीश चंद्र पहले सांसद बने और अपने दो कार्यकाल पूरे किए। इसके बाद जनसंघ के बृजराज सिंह और बृजभूषण लाल ने यहां का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 1971 में कांग्रेस ने यहां वापसी की, लेकिन इमरजेंसी के बाद बदले हालात में जनता पार्टी के राममूर्ति वर्ष 1977 और मिसरयार खां वर्ष 1980 में सांसद बने। वर्ष 1981 और 1984 में कांग्रेस की बेगम आबिदा अहमद दिल्ली पहुंची थीं। इसके बाद भाजपा ने इस सीट को अपने नाम किया और संतोष गंगवार वर्ष 1989 से लगातार छह बार सांसद बने। यहां अंतिम बार वर्ष 2009 में कांग्रेस के प्रवीण सिंह ऐरन ने जीत दर्ज की थी। इसके बाद फिर यहां भाजपा का ही कब्जा है। बरेली लोकसभा क्षेत्र मे करीब 84 हजार वोट बढ़ने के बाद इस बार वोटरों की कुल संख्या 18 लाख 97 हजार तक पहुंच गई है। संसदीय क्षेत्र में अनुमानित तौर पर सर्वाधिक करीब साढ़े पांच लाख की संख्या मुस्लिम मतदाताओं की है। मुस्लिम वोटों के बाद दूसरे नंबर पर सर्वाधिक वोटर कुर्मी बिरादरी के हैं जिनकी अनुमानित संख्या करीब तीन लाख है। इसके अलावा दलित मतदाता लगभग दो लाख, मौर्य और शाक्य सवा लाख, कश्यप 70 हजार, यादव 80 हजार, कायस्थ 65 हजार, पंजाबी 50 हजार और ब्राह्मण एक लाख से ज्यादा है। सपा और कांग्रेस मुस्लिम वोटरों पर दावा तो कर रही हैं लेकिन जिस तरह निकाय चुनाव मे शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों में उमेश गौतम को अच्छे-खासे वोट मिले। उसे देखते हुए भाजपा लोकसभा चुनाव में भी आशान्वित है। इसके अलावा समाजवादी पार्टी के नेता यादव मतदाताओं को लेकर लगभग निश्चिंत है। इसके अलावा कायस्थ, ब्राह्मण और मौर्य-शाक्य बिरादरी में भी अच्छे वोट मिलने की उम्मीद जता रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा की रणनीति ज्यादा से ज्यादा ध्रुवीकरण के साथ सपा के परंपरागत वोटों पर भी हाथ साफ करने की है। पिछले दो चुनाव में भाजपा ने इसी रणनीति के तहत काफी अंतर से चुनाव जीते हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में सपा-बसपा गठबंधन के बाद भी भाजपा चुनाव जीती थी। लेकिन इस बार फर्क यह है कि चुनाव मैदान में आठ बार के सांसद संतोष गंगवार की जगह बहेड़ी के पूर्व विधायक छत्रपाल सिंह गंगवार मैदान में है। इसलिए हाईकमान ने बरेली को उन सीटों में शामिल किया है जहां उसे ज्यादा जोर-आजमाइश करनी पड़ेगी। हालांकि बसपा की तुलना में बरेली में कांग्रेस काफी कमजोर स्थिति में है। इसे भाजपा के लिए थोड़ी राहत की बात भी माना जा रहा है।।

बरेली से कपिल यादव

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