जीएसटी: गिरफ्तारी की व्यवस्था अधिकारों का हनन नहीं

हमारे देश में 2017 में अप्रत्यक्ष प्रणाली माल एवं सेवाकर अधिनियम लागू एवं प्रभावी हुआ। जब यह एक्ट लागू एवं प्रभावी हुआ तो करदाता यानि पंजीकृत डीलर्स बहुत खुश थे, क्योंकि इस अधिनियम में 16 कानूनों को समाहित करते हुए एक्ट के अन्तर्गत व्यवस्था बनायी गई, साथ ही यह भी बताया कि इस कानून के अन्तर्गत रिटर्न सम्बन्धित औपचारिकताएं बहुत कम हो जाएगा और पंजीकृत डीलर्स खुले मन से और खुले हाथों से व्यापार कर सकेगा अर्थात देय कर जमा करने के बाद उसको करचोरी के आरोपण नहीं होगा, यह व्यवस्था इसलिए बतायी जा रही थी क्योंकि एक्ट में ‘कर निर्धारण’ की व्यवस्था नहीं रखी गई। बल्कि पंजीकृत डीलर्स द्वारा दाखिल किये जाने (मासिक/त्रैमासिक एवं वार्षिक) रिटर्नस् ‘स्वतः कर निर्धारण’ व्यवस्था के अन्तर्गत दाखिल किये जाने थे, जैसाकि आयकर कानून में ‘स्वतः कर निर्धारण’ दाखिल होते हैं। लेकिन इस एक्ट में धारा-132 में एक व्यवस्था कर दी गई है वैसे तो इस धारा में क्लेम की जाने वाली आई टी सी को किसी भी दूषित मंशा से अन्य किसी तरीके से क्लेम गई आई.टी.सी. की राशि पर अर्थदण्ड के साथ राशि पर ब्याज की देयता का प्रावधान रखा गया।

जीएसटी एक्ट में एक धारा-69 को भी जोड़ दिया गया है, जिसमें पंजीकृत डीलर्स को गिरफ्तार करने का अधिकार सक्षम प्राधिकारी को दिया गया है। आपको बता दें कि एक्ट की जी.एस.टी. की धारा-69 के अन्तर्गत प्रावधान रखा गया है कि विभागीय सर्वेक्षण के दौरान या कोई कर अपवंचना का आरोपण होता है अथवा कोई अन्यथा कृत्य तो विभाग के सक्षम प्राधिकारी पंजीकृत डीलर को को गिरफ्तार भी कर सकते हैं। इस व्यवस्था गिरफ्तारी की व्यवस्था के कारण बहुत सारी अव्यावहारिक प्रश्न खड़े हो रहे हैं। गिरफ्तारी की व्यवस्था के कारण सबसे बड़ा प्रश्न उठता स्वाभाविक है कि जब पंजीकृत डीलर्स का मुखिया ही जेल में बन्द हो, तो विभाग द्वारा की जाने वाली पूछताछ, जांच व सत्यापन तथा विभागीय अनुपालन कैसे सम्भव होगा। लेकिन ध्यान देना होगा कि गिरफ्तारी की व्यवस्था भारत सरकार के ही वित्त मंत्रालय, के अन्तर्गत आयकर अधिनियम में भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।

आपको याद दिलाना चाहता हूं एक प्रकरण को, कुछ माह पहले आापने पढ़ा होगा कि हरियाणा के गुरुग्राम जनपद में कुछ सीए इस बिना पर विभागीय अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया उनके द्वारा गलत तरीके से आई.टी.सी. को क्लेम किया है। इस प्रकरण को संज्ञान में आने पर विभाग तुरन्त ही हरकत में आया और उन सीए को उनके चैम्बर से उठा लिया, लेकिन प्रश्न यह भी उठता है कि उस गलत क्लेम आई.टी.सी. में उन सी.ए. को दोष सि( हो गया था? क्या उस क्लेम को प्राप्त कराने में केवल सी.ए. ही दोषी थे? क्या गलत तरीके से क्लेम किये जाने पर भुगतान के पोर्टल पर क्लेम स्वीकार करते हुए जारी करने का अधिकार क्या सी.ए. के पास था? और तो और क्या विभाग को गिरफ्तारी का अधिकार प्राप्त है?

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा आपराधिक अपील संख्या 838 आफ 2021 विशेष अनुमति याचिका अपराध संख्या 5442/2021 में निहित आब्जरवेशन (अवलोकन) के तहत जारी किये गये हैं। माननीय न्यायालय प्राप्त निर्देश के क्रम में सीबीआईसी द्वारा एक परिपत्र निर्देश संख्या 02/22 -23 (जी.एस.टी.जांच) जारी करते हुए जी.एस.टी. अधिनियम के तहत गिरफ्तारी व जमानत के सम्बन्ध में नये दिशा-निर्देश एवं गाईडलाईन्स जारी किये। सीबीआईसी को यह गाईडलाईन्स इसलिए जारी करनी पड़ी क्योंकि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा कहा गया कि ‘केवल गिरफ्तारी का प्रावधान होने पर ही गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति की स्वतंत्रता व साख प्रभावित होती है।’ जब तक जांच अधिकारी को यह विश्वास करने का पुख्ता कारण न हो कि सम्बन्धित कारोबारी भाग जाएगा या जारी सम्मनों का अनुपालन नहीं करेगा, तब तक गिरफ्तारी उचित नहीं है। अप्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय के इस आब्जर्वेशन पर विचार करते हुए दिशा-निर्देश जारी किये गये हैं और धारा-132(1)’ एवं ‘धारा-132(2)’ के तहत गिरफ्तार करने की परिस्थितियां वर्णित की गयी हैं कि उन्हीं परिस्थितियों में ही गिरफ्तारी की जाएगी। अपवंचना या आई.टी.सी. का त्रुटिपूर्ण एवं कपट के पुख्ता साक्ष्य एवं उस व्यक्ति के भाग जाने व कार्यवाही में सहयोग न करने की मनोदशा प्रमाणित होने की स्थिति मंे ही गिरफ्तारी होगी।

यहां पर यह स्पष्टरुप से कहना चाहता हूं कि भारत के संविधान में ‘प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकार को सुरक्षित रखने की गारंटी’ दी गई तो देश में व्यापार करने वाले का ‘अधिकार’ से वंचित करना क्या औचित्यपूर्ण‘कहा जाना चाहिए? क्या ऐसे प्रावधान संविधान की अवज्ञा की श्रेणी’ में नहीं आएगा या आता है?’ मैंने अपने कर जानकारी में अनेकों बार लिखा है कि देश में हत्या करना एक अपराध तो हैं लेकिन धारा-69 की व्यवसथा यह सि( करती है कि देश में व्यापार-उद्योग करना एक बड़े अपराध की श्रेणी में आ गया है। अतः मैं स्पष्टरुप से कहना चाहता हंू कि जी.एस.टी. कानून के अन्तर्गत पंजीकृत डीलर अपने को लगाये आरोप से मुक्त होने का और स्वयं का निर्दोष सि( करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया है।

इसके अतिरिक्त जीएसटी एक्ट में किये जाने वाले अन्य प्रावधानों की ओर भी ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं कि जब प्रारम्भ में जीएसटी एक्ट को संसद द्वारा पारित करते हुए देश में लागू और प्रभावी किया लेकिन ‘पांच साल के जीएसटी के सफर में’ जिस प्रकार मूल प्रावधानों में व्यापक बदलाव कर दिये गये या किये जा रहे हैं क्या वह प्रावधान जीएसटी की मूल भावना के अनुरुप कहा जा सकता है? किये जाने वाले प्रावधान की मंशा यह स्पष्ट करती है कि जीएसटी के प्रारम्भ में पंजीकृत डीलर्स को रिटर्न दाखिल करने के साथ क्लेम की जाने वाली आई.टी.सी. को प्राप्त करने का अधिकार सुरक्षित रखा गया था, आप देख सकते एक्ट की धारा-38 को लेकिन वित्त अधिनियम, 2020 एवं 2021 के साथ 2022 के माध्यम से (यानि पिछले दरवाजे से किये जाने बदलाव) कर देना क्या पंजीकृत डीलर के अधिकारों का हनन की श्रेणी में आएगा? आप प्रारम्भ के धारा-38 के प्रावधान और संशोधन के उपरान्त प्रावधान में अंतर आप स्वयं देख सकते हैं।

इस लेख के माध्यम से आप सभी के समक्ष बहुत ही तार्किक और गूढ़ प्रश्न रख रहा हूं। विशेषकर व्यापारिक संगठनों से अपील करना चाहता हूं कि उनको अपने अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए अब आगे आना होगा अन्यथा जी.एस.टी एक्ट के प्रावधान हमारे साथियों के लिए घातक सि( न हो जाऐ।

पराग सिंहल, प्रबंध संपादक

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