बाड़मेर /राजस्थान- मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मुकम्मल रूप से यह साबित कर दिया है कि अधिकांश विधायक उनके नियंत्रण में है और पार्टी के सर्वेसर्वा बने हुए है । दिल्ली में भी उनकी जबरदस्त धाक है । इसी वजह से अनुशासनहीनता के आरोपी नगरीय विकास मंत्री धारीवाल, जलदाय मंत्री महेश जोशी और आरटीडीसी के चेयरमैन का छह व्यतीत होने के बाद भी बाल बांका नही हुआ ।
दरअसल सचिन पायलट की एक गलती की वजह से वे हाशिये पर चले गए । जनता में भले ही क्रेज हो, लेकिन पार्टी और संगठन में उनकी कोई पकड़ नही है । सारी राजनीतिक और प्रशासनिक शक्तियां गहलोत में निहित होकर रह गई है । राजस्थान में कांग्रेस का अर्थ गहलोत है तो गहलोत का मतलब कांग्रेस । आज के हालात में दिल्ली में गहलोत का पूरा दबदबा है । इसलिए पायलट की हर चाल विफल साबित हो रही है ।
एक सप्ताह बाद कर्नाटक के चुनाव परिणाम आ रहे है । यदि यहां कांग्रेस सरकार बनाने में सफल होगई तो मल्लिकार्जुन खड़गे के अलावा गहलोत का दबदबा बढ़ना स्वाभाविक होगा । हो सकता है उस वक्त गहलोत को पार्टी राजस्थान में अपना चेहरा घोषित करदे । पिछले चार साल में पायलट कोई चमत्कार नही दिखा सके, इसलिए उनके समर्थकों का मनोबल भी धीरे धीरे क्षरित हो रहा है ।
हकीकत यह है कि सचिन पायलट कुशल वक्ता, उच्च शिक्षित तथा आकर्षक व्यक्तित्व के धनी है । लेकिन उनमें नेतृत्व करने की क्षमता कतई नही है । इसके अलावा दिल्ली में पैरोकारों का नितांत अभाव है । पंजाब की घटना के राहुल और प्रियंका राजस्थान में फिर से कोई “चन्नी” का मंचन करने से घबरा रहे है । सचिन के संगी-साथी जतिंन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया उनका पल्लू छोड़कर भाग गए । पायलट एक साथी भंवर जितेंद्र प्रसाद कांग्रेस अवश्य है, लेकिन उनका पूरा झुकाव गहलोत के पक्ष में है ।
पायलट के पास सीएम बनने का सुनहरा अवसर था । दिल्ली का उन्हें संरक्षण तो हासिल था, लेकिन कुछ विधायको को छोड़कर उन्होंने किसी से निकटता नही बनाई । परिणाम सर्वविदित है । आप लोगो को ध्यान होगा कि पायलट को प्रतापसिंह खाचरियावास के घर तक गए । अगर पायलट राइट के स्थान पर बाये गहलोत के घर चले जाते तो राजस्थान की तस्वीर ही दूसरी होती ।
शायद उस वक्त सम्मानजनक समझौता हो जाता और राजस्थान की फिजा ही कुछ और होती । विधायक होने के नाते जनहित के मुद्दे उठाना उसका बुनियादी हक है । पायलट ने शहीद स्मारक पर जो धरना दिया, उसे परिपक्वतापूर्ण कदम नही कहा जा सकता । पायलट को चाहिए था कि वे पीसीसी या सीएमआर के बाहर धरना दे सकते थे । कोई भी अनुभवी नेता इस कदम की पैरवी नही कर सकता । इस हकीकत से भी इंकार नही किया जा सकता है कि जांच से ज्यादा अनशन के पीछे राजनीति की बू आ रही थी ।
जिस तरह मानेसर जाने की पायलट इतिहासिक भूल की, अनशन भी उसी गलती की फ़ोटो कॉपी है ।यद्यपि कांग्रेस का बहुत कुछ बिगड़ चुका है । लेकिन गहलोत और पायलट सारे मतभेद भुलाकर गले मिल जाए तो बीजेपी सहित कई पार्टियों को छटी का दूध याद आ जाएगा । उम्मीद है कि कर्नाटक चुनाव के बाद कुछ पुख्ता और प्रभावी बदलाव होने वाले है अगर ऐसा हुआ तो जय और विजय की जोड़ी मचा सकती है जबरदस्त धमाल ।
राजस्थान से राजूचारण
