उत्तराखंड! बस ,उत्तराखंडियाें अब पलायन न करें

उत्तराखंड/पौड़ी गढ़वाल-आज जगह जगह पलायन रोकने पर चर्चायें चल रही हैं। पलायन के पीछे वो लोग ज्यादा चर्चा कर ह रहे हैं जो दो तीन पीढ़ियों से बाहर हैं। इस पलायन को समझने और रोकने के लिए पलायन आयोग भी बन गया है। मुख्यमंत्री से लेकर पलायन आयोग चिल्ला चिल्लाकर कर कह रहे हैं हमने वो नब्ज पकड़ ली है जो पलायन का कारण है वो है- शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोजगार।
बड़ी हैरानी होती है जब नीति नियन्ता विषय की गम्भीरता पर नहीं जाकर सरसरी बयान देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। असली नब्ज को ढूंडने मे कोई गम्भीर कार्य नहीं हो रहा है, और जब असली कारण ही पता नही हो तो फिर पलायन रोकने के प्रयास कितने सार्थक होंगे, आप सहज अनुमान लगा सजते हैं।
अगर इन लोगों की ही बात माने जो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार ही मुख्य कारण मानते हैं तो कुछ निम्न सवाल उनके लिए हैं।
1- उत्तराखंड में सबसे ज्यादा पलायन पौड़ी और अल्मोड़ा जिले का है, तो क्या शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार मे ये दोनों जिले सबसे पिछड़े हैं।
2- शिक्षित आदमी सबसे पहले भाग रहा है, तो पलायन का कारण शिक्षा है।
3- पहाड़ मे रोजगार वाला सबसे पहले अपना परिवार भगा रहा है, तो क्या रोजगार कारण है।
4- ध्वनि प्रदूषण से दूर, साफ हवा पानी छोड़कर शहरों के प्रदूषित माहोल मे जा रहा है तो क्या स्वास्थ्य कारण है। क्या यह स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता है?
5- नजीबाबाद, बिजनौर, बिहार, राजस्थान, और सरदार लोग यहां काम कर रहे हैं, तो क्या रोजगार की इतनी कमी है कि यहाँ का युवक बाहर धक्के खा रहा है।
पलायन को समझने के लिए हमे गॉंव का रुख करना होगा। हमे पलायन का मनोविज्ञान समझना होगा। हमें ग्रामीणों का मन खंगालना होगा, उस पर काम करना होगा।
हमें सबसे पहले और सबसे ज्यादा काम महिलाओं पर करना होगा। पहाड़ों में वो आज भी काम के बोझ से दबी हुई हैं। और उनको आज भी अतीत के काम के भयंकर सपने आते हैं, हमें उनके मन से वो डरावने सपने निकालने होंगे। आज कोई भी महिला अपनी बेटी की शादी पहाड़ मे करने को तैयार नही है। शहरों में कामकाजी महिलाओं के लिए मेटरनिटी लीव छः माह है लेकिन यहां खेतीबाड़ी करने वाली महिला के लिए छः दिन नहीं हैं।
एक तरफ काम का बोझ और दूसरी तरफ वो काल्पनिक दुनिया जिसे यहां की महिला और बच्चा टीवी को देखकर साक्षात रूप मे जीना चाहता है, लड़के को आज की मॉल शॉपिंग और मल्टीप्लेक्स देखना ही है। यह सब स्वाभाविक भी है। यह बिना गॉंव से निकले सम्भव भी नहीं है। तो सवाल है फिर क्या करना है। हरेक के काफी सुझाव हैं, मेरे भी हैं, वो कुछ इस प्रकार हैं।
1- पलायन पलायन कह कर इसकी हवा ना बनायेँ।
2- कुछ तथ्यों को समझें, जो पहाड़ से गए यह उनका चुनाव था यह उनको मुबारक।
3- हमारे पास जो प्राकतिक संसाधन बचे हैं उनसे जीविकापार्जन करना उतने लोगों के लायक ही है, जितने आज यहां बचे हुए हैं।
4- जिस दिन लगभग 30 लाख लोग वापस आ जाएं तब सबके लिए ना तो पानी और न ही जमीन बचेगी।
5- आज अगर सभी वासी प्रवासी को मिलाकर एक 25 वर्षीय युवा की औसत जमीन का एक अनुमान लगायेँ तो शायद 2-3 नाली से ज्यादा नहीं बैठेगा। यह दो लोगों के परिवार को भी नही पाल पाएगा।
6- इसलिए जो जा रहा है उसे जाने दें जो रुक रहा है उसे जागरूक किया जाए,। उसे प्राकृतिक संसाधनो के उचित नियोजन को समझाया जाए। महिलाओं के काम के बोझ को कम किया जाये। उनके मैनुअल वर्क को मैकेनिकल वर्क मे लाने का प्रयास किया जाए।
7- कोई भी प्राकृतिक संसाधन राष्ट्रीय संसाधन माना जाए। अगर इसका उपयोग हो रहा है तो यह सही बात है, अगर उपयोग नहीं हो रहा तो उन लोगों को आंशिक रूप मे दण्डित करने का प्रावधान हो, जो उस पर अधिकार जमाए हुए हैं। जैसे लगातार बढ़ रहे बजंर खेत उस आदमी पर कोई टैक्स लग जाए जिसका उस पर कब्जा है। आय का इतना बड़ा संसाधन जो राज्य की जी. डी.पी. मे बड़ा योगदान देती वो बजंर होना या अनुपयोगी होना एक अपराध बनता है। जिसका दोष सम्बंधित आदमी से लेकर सम्बंधित विभाग तक होना चाहिए।
8- बजंर खेतों के लिए एक नीति बन जाए वो यह कि इनको हर हालात में आबाद करना ही है। या तो जिसके खेत हैं, वो करे । नही तो भूमि मालिक उसे किसी दूसरे को आबाद करने के लिए एग्रीमेंट पर दे दे। अगर यह दोनों सम्भव नहीं तो कृषि , उद्यान और औषद विभाग उसे आबाद कर एक आदर्श मॉडल बनाये। इसके बाद भी बजंर होता है तो जमीन पर टैक्स लगाया जाए जिसे भू मालिक दे, पर यदि भूमि मालिक जमीन को इन विभागों को सुपर्द करता है और तब बजंर होता है तो, सम्बंधित विभागों के कर्मचारी को जिम्मेवार माना जाए।
बंजर खेत रोजगार के साधन, आय के साधन बन जायें यदि इस फॉर्मूले पर काम किया जाए-
9- सबसे जरूरी आज जो लोग रिवर्स माइग्रेशन के तहत वापस आ रहे हैं, उनको बड़ा महत्व दिया जाए। जो प्रवासी वापस आ रहा है वो एक विज़न के साथ, अपनी मोटी जमा पूंजी के साथ, स्वरोजगार उत्पन्न करने के लिए, यहां इन्वेस्ट करने के लिए, उत्तराखंड की जी डी पी बढ़ाने के लिए आ रहा है। उसको उसके सारे कार्यों के लिए सिंगल विंडो सिस्टम बनाया जाए। यह रिवर्स माइग्रेशन वाला किसी भी हालात मे टूटकर वापस नहीं जाना चाहिए वर्ना हमारे कुछ लोगों के बीच मे जो तीस साल पहले के पहाड़ को जानते हैं, यह धारणा बलवती होगी कि पहाड़ मे धरातल पर अभी कुछ परिवर्तन नहीं हुआ।।

सुधीर कुमार सुन्दरियाल / संजय बुडाकाेटी
इंद्रजीत सिंह असवाल

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