अब तो राम राज्य की आशा करें या फिर नकल गिरोह माफियाओं के आगे बेबस और लाचार…

बाड़मेर / राजस्थान- आजकल जगह जगह पर हो रही लूट खसोट और जानबूझकर एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ लगी हुई है सभी सरकारी कार्यालयों में अधिकारियों ओर कर्मचारियों को लाखों करोड़ों रुपये की धन दौलत इकट्ठा करके अपने परिवारिक सदस्यों की जिंदगी बरबादी की ओर लेकर जा रहे हैं l जगह जगह पर हाइटेक प्रणाली के साधनों से लैस होकर मोबाइल फोबिया के साथ युवा पीढ़ी रातों रात
अमीर बनने के ख्वाब सजोंकर अपराध माफियाओं द्वारा गिरोह बनाकर रामराज्य की आशा वाले राज्य में सरकारी नौकरियां प्राप्त करने वाले बेरोजगार स्टुडेंट्स की परिक्षाओं में धडल्ले से पेपर बिकाऊ हो रहा है,
बेरोजगार स्टुडेंट्स लाचार होकर धरना प्रदर्शन कर मुख्यमंत्री भजनलाल सरकार से न्याय माग रहे हैं लेकिन न्याय बहुत ही सुंदर शब्द है जो आजकल मिलना बहुत ही मुश्किल लगता है l लेकिन हमारे बडे़ बुजुर्गों ने कहा कि अभी तक माखण डुबा नहीं है जरूर कोई न कोई आपकी समस्याओं का समाधान जरूर होगा इस धरती पर… ❓

आइए, सबसे पहले रामराज्य की राजनैतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में रामायण की ओर चलते हैं और वर्तमान से उसका सम्बन्ध स्थापित करते हैं। उस काल में भारत में कई स्वतन्त्र राज्य थे – जैसे मिथिला, काशी, कौशल, केकय, सिंधु, सौराष्ट्र, बंग, अंग, मगध, मत्स्य और सौवीर। वस्तुत: हिमालय से लेकर विन्ध्य पर्वत श्रेणी के मध्य का भूभाग ही आर्यावर्त कहलाता था और इसके दक्षिण में वानरों और राक्षसों के राज्य थे। ऐसे में श्री राम ने अश्वमेध यज्ञ कर राजनैतिक नहीं, अपितु सांस्कृतिक साम्राज्य स्थापित किया। उनके राज्य को ‘मर्यादित राजतंत्र’ कहा जा सकता है।

जनसामान्य किसी अस्थाई सरकार से उत्पन्न होने वाली अराजकता से परिचित थे, अत: सभी का एक योग्य और वैधानिक शासक द्वारा एक शक्तिशाली और संगठित राष्ट्र-व्यवस्था में परम विश्वास था। इस आदर्श का महत्व तो आज के परिदृश्य में स्वत: ही समझ में आता है। आज जहां हर जगह राजनैतिक स्थायीत्व का सर्वथा अभाव है, वहीं इसके परिणाम स्वरूप सभी सरकारी नीतियों और योजनाओं का यदा-कदा सरकारें बदल जाने से अधरझूल में ही लटके रह जाने की स्थिति भी आम बात है। जनता और जनप्रतिनिधि, दोनों में ही मर्यादाओं का भारी अभाव है और जहां जनता केवल निजि लाभ को ध्यान में रख मतदान करती है, वहीं तथाकथित नेता लोग कभी ‘गठबंधन’ तो कभी ‘शठबंधन’ कर कुत्सित राजनैतिक खेल खेलते रहते हैं। ऐसे में राम-राज्य के मर्यादित राजतंत्र को हल्का सा रूपांतरित कर एक ‘मर्यादित जनतंत्र’ की स्थापना होनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है की राष्ट्र के पास कोई राम जैसा नायक हो, जो पूरे देश को संगठित कर सके।

राम की नेतृत्व क्षमता तो इस बात से ही समझी जा सकती है कि उन्होंने कई राजनैतिक इकाइयों में बंटे राष्ट्र को जिस प्रकार धर्म के पक्ष में एकत्रित किया, वह उनके समय में और कोई नहीं कर सकता था। संगठन शास्त्र की दृष्टि से श्री राम ने जिनको प्रेरणा स्रोत माना, वे थे कार्तवीर्य सहस्रार्जुन और परशुराम। इन दोनों ही आचार्यों के मार्ग परस्पर विरोधी थे, किन्तु दोनों की ही आवश्यकता थी। श्री राम ने इन दोनों का अद्भुत एकीकरण किया। सहस्रार्जुन ने स्वार्थी लोगों का व्यक्तिनिष्ठ संगठन बनाया था और इसके विपरीत परशुराम का संगठन अमूर्ततत्वाधिष्ठित था, अर्थात, उसमें स्वार्थ का लेश मात्र भी नहीं था। राम ने भी जहां एक ओर सुग्रीव आदि से स्वार्थपरक भले ही वह धर्म-विजय से सम्बंधित हो संधि की, वहीं दूसरी ओर विभीषण और उसके साथियों जैसे निस्वार्थभावियों को भी धर्म ध्वजा का संरक्षण प्रदान किया। निस्वार्थ भाव से स्वर्णमयी लंका जीत लेने के बाद भी उसके असली हकदार विभीषण को राज्य समर्पित कर राम ‘विश्व के हृदय-सम्राट’ बन गए।

– राजस्थान से राजूचारण

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