प्रतिबंधित पशुओं की कुर्बानी ना करें:मौलाना फ़ैजान अशरफ हामिदी

* मुसलमानों की शरीअत कानून, सफ़ाई, अमन और सामाजिक ज़िम्मेदारी — इन सभी पहलुओं को सामने रखकर त्यौहार मनाना चाहिए

* ईद उल अज़हा के मौके पर मुस्लिम समाज के लिए दिए अहम दिशा-निर्देश

सम्भल। तंज़ीम उलामाऐ अहले सुन्नत के जर्नल सेक्रेटरी मौलाना फ़ैजान अशरफ हामिदी ने अगामी पर्व ईदुल अज़हा पर मुस्लिम समाज से अपील करते हुए कहा है कि ईदुल अज़हा पर प्रतिबंधित पशुओं की कुर्बानी ना करें कुर्बानी इबादत है, दिखावा नहीं ईद उल अज़हा का मक़सद रिया (दिखावा) फोटोबाज़ी या सोशल मीडिया प्रदर्शन नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा और हज़रत इब्राहीम علیہ السلام की सुन्नत की पैरवी है। वीडियो, रील और अनावश्यक फोटो शेयर करने से बचें। ऐसी पोस्ट न करें जिससे किसी दूसरे धर्म के लोगों की भावना भड़कें। कानून और प्रशासनिक निर्देशों का पालन करें भारत एक संवैधानिक देश है, इसलिए केवल वैध और शरीअत के मुताबिक जानवर की ही कुर्बानी करें।
जिन जानवरों पर सरकारी रोक हो, उनसे पूरी तरह बचें।
प्रशासन द्वारा तय स्थान, समय और सफ़ाई नियमों का पालन करें। सार्वजनिक स्थानों, सड़कों और खुले चौराहों पर कुर्बानी से बचें।
कानून की पाबंदी शरीअत के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि अमन बनाए रखने का ज़रिया है।

  • सफ़ाई और पर्यावरण का विशेष ध्यान रखें इस्लाम पाकीज़गी का दीन है।
    कुर्बानी के बाद ख़ून, गंदगी और अवशेष तुरंत साफ़ करें।
    जानवरों की बची हुई चीज़ें खुले में न फेंकें। नगर पालिका या प्रशासन के निर्देशों के अनुसार डिस्पोज़ल करें। बदबू और गंदगी से पड़ोसियों को तकलीफ़ न हो।
    याद रखें: “सफाई आधा ईमान है। पड़ोसियों और दूसरे धर्मों की भावनाओं का सम्मान करें इस्लाम अमन, रहमत और इंसानियत का पैग़ाम देता है। तेज़ आवाज़, नारेबाज़ी और उकसाने वाले व्यवहार से बचें। गैर-मुस्लिम पड़ोसियों का भी सम्मान करें। सोशल मीडिया पर बहस, तंज़ और भड़काऊ पोस्ट न करें। बच्चों और युवाओं को भी तहज़ीब सिखाएँ। सोशल मीडिया पर विशेष सावधानी रखें आज बहुत से फ़ितने मोबाइल और सोशल मीडिया से फैलते हैं।
    कुर्बानी की तस्वीरें और वीडियो वायरल न करें। किसी विवादित पोस्ट को बिना पुष्टि शेयर न करें।
    धार्मिक या राजनीतिक उकसावे वाली सामग्री से दूर रहें। अगर कोई भड़काने की कोशिश करे तो जवाब देने के बजाय स्थानीय प्रशासन एवं जिला प्रशासन को सूचना दें।
  • मस्जिदों और इमामों की ज़िम्मेदारी उलेमा और इमाम समाज की रहनुमाई करें।
    ईद के ख़ुत्बों में अमन, सफ़ाई और कानून पालन पर ज़ोर दें। नौजवानों को सब्र और अख़लाक़ की तालीम दें। अफ़वाहों से बचने की ताकीद करें। स्थानीय प्रशासन से संवाद बनाए रखें। गरीबों और ज़रूरतमंदों का ख़ास ख़याल रखें
    ईद की असली खुशी तब है जब गरीब भी खुश हों कुर्बानी के गोश्त में गरीबों का हिस्सा प्राथमिकता से दें।
    विधवाओं, यतीमों और मज़दूर परिवारों की मदद करें। फिजूलखर्ची के बजाय मानवता की सेवा करें।
  • नौजवानों के लिए विशेष नसीहत
    आज सबसे अधिक ज़िम्मेदारी युवाओं पर है।
    बाइक स्टंट, हंगामा और भीड़बाज़ी से बचें।
    धार्मिक जोश में कानून हाथ में न लें।
    किसी उकसावे में आकर प्रतिक्रिया न दें।
    अपने चरित्र से इस्लाम की अच्छी तस्वीर पेश करें।
  • अफ़वाहों से बचें
    ईद के दिनों में कई बार झूठी खबरें फैलती हैं।
    हर वायरल मैसेज पर यक़ीन न करें।
    किसी भी विवाद की स्थिति में स्थानीय प्रशासन और जिम्मेदार उलेमा से संपर्क करें।
    अमन बनाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।
  • देश में अमन और भाईचारे की दुआ करें।
    “एक सच्चा मुसलमान वही है जिससे दूसरे लोग सुरक्षित रहें।
    ईद उल अज़हा का त्योहार हमें कुर्बानी, सब्र, मानवता, सफ़ाई और अमन का संदेश देता है।
    हमें ऐसा व्यवहार करना चाहिए जिससे दीन की खूबसूरत तस्वीर समाज के सामने आ सके ।
  • — सम्भल से सैय्यद दानिश

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