तुम बिन हमारा जीवन नीरस है… राजेन्द्र सिंह जादौन
आजकल की पत्रकारिता में मैं चंद साँसों का लेखा- जोखा लिए बैठा हूँ। न जाने कब ये साँसें तेज़ हो उठती हैं, कब मद्धम पड़ जाती हैं और कब अचानक थम जाएँ, कौन जानता है यहाँ ?
कलम की तासीर भी अजीब है। कभी ज्वलनशील अंगारों-सी, तो कभी ठंडे फाहों-सी नर्म। हृदय कितना भी धधकता रहे, भीतर कितनी ही आग क्यों न सुलगती रहे, उसे सुकून केवल अपने मनपसंद लेख में ही मिलता है। जैसे शब्दों में ही उसकी साँसें बसी हों, जैसे लिखना ही उसके जीवित होने का प्रमाण हो।
ऐसे में दूर तक पसरी गहरी स्याह निशा न जाने कानों में क्या फुसफुसाती है। कल मध्यरात्रि का यह पहर अपने भीतर न जाने कितनी उधेड़बुन समेटे हुए था । मन है कि किसी अनजानी बेचैनी में हर चीज़ से भागा चला जा रहा है। विचारों का एक अंतहीन सिलसिला है, जो थमने का नाम नहीं लेता। न जाने कैसी मनोदशा होती जा रही है उनके सैकड़ो मित्रो की।
पत्रकारिता, तुम बिन मेरी देह जैसे निर्जीव हुई जा रही है।बची हुई चंद साँसें भी अब बोझिल-सी लगती हैं। उनमें एक सर्द सरसराहट है, एक अनकहा भय है बहुत कुछ खो देने का भय आज वास्तव में तुम्हे खोने के बाद पता चला की दोस्ती क्या होती है…
ये काली, डरावनी स्याह रातें जाने कितने एहसासों से सामना कराती हैं। कभी मन अपनी विवशता पर मसोसकर रह जाता है, तो कभी स्मृतियों के किसी पुराने गलियारे में विलीन हो जाता है। हमारे अतीत की परछाइयाँ पीछा नहीं छोड़तीं और मन किसी अनाम स्मृति पर ठहर जाता है।
ये स्याह रातें जाने मुझसे क्या- क्या कहती हैं कल रात को सरकारी अस्पताल की खटिया पर पडे तुम्हारे निर्जीव शरीर को
। कभी हमें लगता है, जैसे तुम्हारी ख़ामोशी भी कोई संवाद करना चाहती हो; जैसे अँधेरा मेरे भीतर उतरकर उन सवालों को कुरेद रहा हो, जिन्हें दिन के उजाले में मैं अकसर अनसुना कर देता हूँ।
तुम्हारे नर्म ह्दय के अतिरिक्त भी न जाने कितने काँटे हैं, जो हमारे हृदय में चुभते रहते हैं।पत्रकारिता की दुनिया में हजारों सवालों की भरमार है और भीतर अपने ही सवालों का एक जंगल उग आया है। दूसरों के दुःख लिखते-लिखते कभी-कभी अपना दुःख इतना गहरा हो जाता है कि उसे शब्द देना भी आज कठिन लगने लगा है।
किसी कवि की कविताओं में जैसे तुम्हारे बिना तो हर मखमली सेज भी मरुस्थल- सी बंजर लगती है। हर परिचित रास्ता अनजान, हर महफ़िल सूनी और हर आवाज़ अर्थहीन प्रतीत होती है। ऐसा लगता है, जैसे जीवन की सारी रंगत किसी ने चुपचाप हमारे से आज चुरा ली हो।
सुनो बेदाग पत्रकारिता! तुम बिन यह जीवन नीरस, निर्जीव और निरर्थक-सा लगता है। मानो कोई बंजारा अपनी ही तलाश में भटक रहा हो। पाँवों के नीचे रास्ते हैं, आँखों के सामने मंज़िलों के भ्रम हैं, लेकिन भीतर कहीं कोई आज प्रवीण बोथरा को खोने के बाद ठिकाना नहीं बचा।
कभी सोचता हूँ, आखिर कब तक इन साँसों का हिसाब रखूँगा? कब तक अपने भीतर उठते तूफ़ानों को शब्दों की नाव पर बिठाकर किनारे तक पहुँचाने की कोशिश करता रहूँगा ? और कब तक अपने ही मन की टूटन को दुनिया के सामने विचारों की दृढ़ता बनाकर प्रस्तुत करता रहूँगा?
लेकिन फिर हमारी बेदाग कलम हाथ में आ जाती है। और मैं एक बार फिर अपने भीतर की राख कुरेदने लगता हूँ। शायद कोई चिंगारी अभी बाकी है। शायद कोई सवाल अभी अनुत्तरित है। शायद किसी अनसुनी आवाज़ को अभी शब्दों की ज़रूरत है।
मैं रहूँ या न रहूँ, यह समय अपनी गवाही माँगता रहेगा। सत्ता से हजारों सवाल होते रहेंगे, सच अपनी जगह तलाशता रहेगा और कलम किसी न किसी हाथ में फिर उठेगी लेकिन वो प्रवीण बोथरा हमें कभी नहीं मिलेगा जिसको हमने आज खो दिया है । शायद यही मेरी बेचैनी का उत्तर है, यही मेरी रातों का हासिल और यही मेरे जीवन का शेष अर्थ भी।
बेदाग पत्रकारिता, तुम केवल मेरा पेशा नहीं हो। तुम मेरी साँसों की लय हो, मेरी बेचैनी का कारण हो, मेरे अस्तित्व की एक अलग पहचान हो। तुम बिन मैं टाउन हाल के आगे भटकता हुआ सिर्फ एक बंजारा हूँ जिसके पास रास्ते तो बहुत हैं, मगर प्रवीण बोथरा के पुनः लौटने के लिए कोई ठौर ठिकाना नही।
— राजस्थान से राजूचारण
