बाड़मेर /राजस्थान- सोशल मीडिया पर मजबूत पकड़ और पहुंच रखने वालो के लिए आने वाले समय में शुभ शुभ है। लेकिन हमारे देश के अखबारों के लिए यह खतरे की घंटी है। सोशल मीडिया ने पहले ही प्रिंट की राह दुश्वार कर रखी थी ,अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अपनी आमद दर्ज कराने को आमादा है। आने वाले समय में समाचार पत्रों के लिए यह संकट का संदेश है।
एक्सेल स्प्रिंजर जर्मनी का कदाचित सबसे बड़ा समाचार समूह है। इसके मालिक मेथियस डोपनर ने चार दिन पहले अपने कर्मचारियों को चिट्ठी लिख कर भावी जीवन के लिए सचेत किया है। डोपनर कहते है अब मीडिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को रोका नहीं जा सकता है। कुछ की नौकरियां जा सकती है। पर कहा अभी पत्रकारों को खतरा नहीं है। साथ ही यह भी जोड़ा की वे भविष्य की जमानत नहीं दे सकते है।उन्होंने अपने कर्मचारियों से कहा ‘ डिजिटल ग्राहकी पर जोर दे।अपने आप को वक्त की जरूरत के मुताबिक ढाल ले।
डोपनर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को उपयोगी बताते है।अपने खत में कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसमें वो कूबत है कि वो स्वतंत्र पत्रकारिता को पहले से भी बेहतर ढंग से अंजाम दे सकती है। या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में उसकी जगह लेने का गुण धर्म है। “Artificial intelligence (AI) has the potential to make independent journalism better than it ever was — or simply replace it’/ ये समूह जर्मनी में दो सबसे बड़े और प्रमुख अखबारों का प्रकाशन करता है। डोपनर के मुताबिक अभी भी समूह को सबसे अधिक आमदनी डिजिटल मीडिया से ही हो रही है। इस ग्रुप में विश्व भर में अठारह हजार लोग काम करते है। इनमे 3400 पत्रकार है। यह इत्तेफाक है कि दुनिया का पहला अख़बार 413 साल पहल जर्मनी से ही प्रकाशित हुआ था।
पिछले कुछ समय से प्रिंट मीडिया के अखबारों को मुसीबतो का सामना करना पड़ रहा है। यूनिस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार ऑनलाइन जर्नलिज्म ने न्यूज़ मीडिया का कारोबारी निजाम ध्वस्त कर दिया है। विज्ञापन का बड़ा हिस्सा दो कम्पनियो गूगल और मेटा की भेंट चढ़ रहा है।सोशल मीडिया यूजर्स की संख्या 2016 में 2 . 3 बिलियन थी ,2021 में यह 4 . 2 बिलियन हो गई। रिपोर्ट के अनुसार कोविड में राजस्व घटा ,नौकरिया गई ,न्यूज़ रूम बंद हुए। यह वो दौर था जब रिपोर्टर फ्रंट लाइन यौद्धा की तरह कोविड कवर कर रहे थे। कुछ ने जान भी गवाई। इसके उल्ट ,यूनेस्को ने इनफो डेमिस्क्स की रिपोर्ट का हवाला देकर कहा 2020 में कोरोना को लेकर सोशल मीडिया पर दस लाख ऐसी पोस्ट डाली गई जो भ्रामक और गलत तथ्य से भरी थी। यूनेस्को कहता है सूचना इंसान का मौलिक अधिकार है। पर वो खतरे में है।
दुनिया के बाकी हिस्सों से इतर ,भारत में प्रिंट मीडिया ने प्रगति की रफ्तार बनाये रखी है।विज्ञापनों में प्रिंट मीडिया का हिस्सा अब भी बीस प्रतिशत है। जबकि यूरोप और अन्य भागो में यह महज पांच फीसद रह गया है। भारत में 2005 तक प्रिंट मीडिया को 53 प्रतिशत विज्ञापन मिलते थे। अब 45 प्रतिशत डिजिटल और 40 फीसद टीवी चैनल्स समेट लेते है।अब प्रिंट मीडिया भी डिजिटल पर जोर दे रहे है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकॉनमी के मुताबिक 2016 में मीडिया एंड पब्लिशिंग में दस लाख लोग काम करते थे। पर इसी ने एक रिपोर्ट में कहा 2021 में यह तादाद दो लाख तीस हजार रह गई।
अमेरिकी पत्रकार डेविड बाडर ने एक रिपोर्ट में अमेरिका में प्रिंट मीडिया की खराब हालत की तस्वीर बयां की है।वहां हर हफ्ते दो अख़बार अपना दम तोड़ देते है। 2005 में 8891 अख़बार थे। अब वहां 6377 अख़बार रह गए है। 2006 तक 75 हजार पत्रकार थे। 2022 में इनकी संख्या 31 हजार रही गई। ट्रम्प के कार्यकाल में मीडिया पर हमले भी बहुत हुए। तभी वाशिंगटन पोस्ट ने 145 साल के इतिहास में पहली बार अपना ध्येय वाक्य में तबदीली की और मुख पृष्ठ पर लिखा -अंधकार में लोकतंत्र मर जाता है। Democracy dies in darkness/ रुपोर्ट मुर्डोक ने कभी कहा था -क्लासिफाइड विज्ञापन और प्रिंट मीडिया सोना देने वाली नदी है। अब वो कहने लगे है दरिया कभी सूख भी जाती है।
ब्रिटेन में द टेलीग्राफ जैसे अख़बार भी संकट की खबरे देते रहे है। इसके मुकाबले भारत में अख़बार ठीक हालत में है। प्रिंट के प्रति भरोसा भी है। पश्चिम में अख़बार मालिक सिर्फ अख़बार तक सिमित रहते है। भारत में अख़बार को बहुत सारे काम करने पडते है। वे अख़बार भी चलाते है और सरकार भी। वो फोर्थ एस्टेट भी है और रियल एस्टेट भी। वो शॉपिंग फेयर भी चलाते है। वो प्रॉपर्टी एक्सपो लगाते है। वो बुक फेयर से लेकर न जाने कितने कितने काम करते है और अपने अख़बार भी चला लेते है।
चीन में कागज का आविष्कार हुआ/ इस कागज ने दुनिया को हिलाया नहीं बल्कि मिलाया। फिर जर्मनी में प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार हुआ, अल्फाज कागज पर उतर आये और खतो किताबत हुई। इसी तरक्की में चिठिया आई और गीतकार शैलेन्द्र का लिखा हुआ गीत गूंजा – चिट्ठियां हो तो हर कोई बांचे ,भाग ने बांचे कोई। लेकिन अब चिट्ठियां खुद अपने वजूद का भाग्य पढ़वाना चाहती है। अब कागज भी उसी राह पर है। अख़बार न हो तो एक सन्नाटा पसर जाता है।थॉमस जेफरसन से किसी ने पूछा ‘ बिना अख़बार के सरकार या बिना सरकार के अख़बार तो क्या चुनोगे ? जेफरसन ने कहा सरकार भले ही न रहे पर अख़बार जरूर रहने चाहिए।
अख़बार न होंगे तो प्रिंट मीडिया को लेकर बनी कहावते , परम्पराये , लोकोक्तियाँ ,अनमोल वचन और परिभाषाये आने वाले समय में ओझल हो जाएगी।
फोटो -हिक्की गजट ,भारत का पहला अख़बार
– राजस्थान से राजूचारण
