*व्यवस्थाओं की खामियों को उजागर करता मात्र 40% मतदान
बरेली। निकाय चुनावों के मतदान का कम प्रतिशत अनेकों सवाल तो खडा करता ही है साथ ही एक दुखद अहसास का बोध भी कराता है।
निकाय चुनाव हमारी रोजमर्रा की जिऩ्दगी की सहजता के लिए हमारे साथ खडे होने, व्यवस्थाओं का ज़न जन तक लाभ पंहुचाने वाले व्यक्तियों का चुनाव हैं। शहर का स्वास्थ, स्वच्छता, पीने योग्य पानी और विकास की जिम्मेदारी नगर निकाय की होती है, जो हमारे रोजमर्रा की जिऩ्दगी का हिस्सा है। सवाल खंड़े होना और उनका आंकलन जरूरी है कि मतदाता उदासीन तो क्य़ों ?
चुनाव के प्रति मतदाताओं की उदासीनता के मायने व्यवस्थाओं के प्रति अविश्वास भी एक बड़ा कारण हो सकता है। यदि यह सत्य है तो प्रशासनिक व्यवस्थाओं , सरकारी योजनाओं और उनके प्रतिपादन के तरीकों पर सवाल खडे होना लाजमी है। जिस प्रकार शहर के विकास की योजऩाओं का प्रतिपादन हुआ उसमें जनता ने अपने को काफी लाचार महसूस किया होगा, कि जो हो रहा है उसके लिए सवाल पूछें भी तो किससे पूछें और सवाल पूछने से क्या कोर्ई फर्क भी पडेगा जनता को ये लाचारी भी काफी खली होगी।
जहां एक बडा एवं बुनियादी कारण वोटर लिफ्ट से बड़ी संख्य़ा में वोटरों के नाम गायब होना। इस पर चुनावी व्यवस्थाओं के पुर्नआकलन की आवश्यकता होगी। किसी भी वोटर का वोटिंग अधिकार हमारे लोकतंत्र की बुनियाद है। लचर व्यवस्थाओं के कारण यदि कोई नागरिक इससे वंचित होता है तो ज़ाहिर है यह मुद्दा जबाबदेही की जद में जरूर आयेगा।
बही दूसरी ओर सियासी समीकरणों की उठापटक भी एक अहम् मुद्दा हो सकता है। सच यह हैं कि यह यह चुनाव किसी को हराने की दौड का चुनाव नहीं वरन् जिम्मेदार और योग्य व्यक्ति चुनने का चुनाव है। जिसका निर्णय स्वयं जनता को करना होता है। निकाय चुनावों में सियासत की अत्यधिक दखल अंदाजी भी वोटरों के लिए कहीं न कहीं हताशा का सबब होती है। सियासी गलियारों में टिकिट के लिए प्रत्याशियों की हताशा ने भी शायद मतदान प्रतिशत को कुछ हद तक प्रभावित किया हो जिसका आकलन परिणाम आने के बाद सियासतदरों को खुद करना होगा।
( डॉ कौशल कुमार की कलम से )
