शहादत हमारी कभी बेकार नहीं जाएगी लेकिन ओछी राजनीति पर रूहें जरूर कांपती है हमारी- राजूचारण

बाड़मेर/राजस्थान- देश में कई सरकारें बदलीं, सेनाध्यक्ष भी बदले लेकिन नहीं बदली तो पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन की ओछी फितरत। क्या यूपीए क्या एनडीए, न सीमाओं पर जवानों की शहादत का सिलसिला थमा, न ही पाकिस्तान, चीन की हरकतों पर लगाम लगा रही है। पिछले सालों सितंबर का सर्जिकल स्ट्राइक भी पाकिस्तान को सबक सिखाने में नाकाम सा लग रहा है। इसका ताजा सबूत है पिछले साल की लेह लद्दाख क्षेत्र के गर्भाशय घाटी में भारतीय जवानों के साथ हुई बर्बरता। देश की सवा सौ करोड़ जनता एक बार फिर कड़़े एक्शन की मांग कर रहा है, लेकिन सियासत के अपने तकाजे हैं, सो बयानबाज़ी भी हमेशा की तरह जमकर हो रही है जैसे पहले के दौर में होती थी ।

एक ओर बदहाली पर गुजर बसर करने को छटपटा रहा पाकिस्तान समर्थक चीन की बर्बरता के शिकार हुए शहीदों को अंतिम विदाई दी जा रही थी तो दूसरी तरफ पूरे देश के लोगों में गुस्से का भारी उबाल था। हमेशा की तरह देश की सरकारें और सेना ने इस कायरता की कड़ी निंदा करते हुए पाकिस्तान और चीन को सख्त संदेश दिया था। लेकिन शहीदों के घरवालें अब सख्त संदेश के आगे बढने का एक्शन मांग रहे थे। सरकार कह रही है कि हमारे सैनिकों की शहादत जाया नहीं जाएगी, लेकिन अब तक ये साफ नही हैं कि क्या ठोस एक्शन होगा। इस सम्बन्ध में आगे की रणनीति के लिए रक्षा मंत्री प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिले होंगे लेकिन आज भी हमारे देश की जनता का पडोसी मुल्कों को करारे जवाब का इंतजार है ।

लिखने में बहुत ही शर्म महसूस होती है कि पहले सुकमा में सीआरपीएफ जवानों पर हमला, फिर पुलवामा में आर्मी कैम्प पर अटैक और फिर भारतीय जवानों के साथ शर्मनाक बर्बरता। इस पूरे घटनाक्रम में विपक्ष को सिर्फ मौका दिखा है। एनडीए कार्यकाल में कितने शहीद हुए और यूपीए में कितने शहीदों कि गिनती नेताओं ने शुरू कर दी है। लेकिन भारतीय सेना के वीर और शहीदों के घरवाले इस ओछी राजनीति से परेशान है। भारत की जनइस एक बार कड़ा एक्शन चाहती है, ना कि राजनीतिक बयानबाजी। सवाल है, कि ये कड़ा एक्शन है क्या और भारत सरकार का अगला कदम क्या होगा। अब हद हो गई है। कितने दिन ऐसे इंतजार करेंगे। वो हमारे जवानों के सर काटेंगे, उनके शरीर के साथ भी खिलवाड़ करेंगे और इस गुस्ताखी के बाद भी हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे। आओ और हमारे सर पर उछल-कूद कर हमें बर्बाद करो।ऐसा कब तक चलेगा। शहीदों को सिर्फ नेताओं और पब्लिक द्वारा सिर्फ श्रद्धांजलि, दुश्मनों की कड़ी निंदा, आतंकवादी हरकतों पर गहरी चिंता। पाकिस्तान को निर्णायक सबक सिखाने की चेतावनी ये सब कब तक काम करेगा। सवाल है कि इस बीमारी का आखिरकार इलाज क्या है! यहां इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की सरकारों में कोई कोशिश की गई है ?

हमेशा की तरह एक दूजे की देखादेखी शहीदों के परिजनजों का सांत्वना देना, मदद की घोषणा करने में सियासत की बू आती है। आजकल राजधानी में
वोट बैंक की तुच्छ राजनीति और एक दूसरों को नीचा दिखाने की होड़ में राजनीतिक दलों के नेताओं को इंसानी जज्बातों की कोई चिंता नहीं होती है और राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते हैं।

रक्षा मंत्रालय का रिकॉर्ड देखलो, देश की सीमा और आंतरिक सुरक्षा के दौरान हर वर्ष देश में सैंकड़ों सैनिक शहीद हो जाते हैं। राजनीति चमकाने के लिए मगरमच्छी आंसू बहाने वाले नेताजी चार दिन के बाद ये जानने की कोशिश भी नहीं करते हैं कि शहीद का परिवार किसी हाल में गुजर-बसर कर रहा है। सरकार, प्रशासन और राजनीतिक दल तो मदद के नाम पर सहानुभूति बटोरने और खुद को परिवार का सबसे करीबी होने का सिर्फ नाटक करते हैं लेकिन उन्हें रोते-बिलखते परिजनों के दुख का रंच मात्र भी अहसास नहीं होता है। ये कोई पहला ऐसा वाक्या नहीं है कि शहीदों की शहादत पर सियासत हो रही हो। सरकार और संवेदनहीन प्रशासन की दृष्टिï में अगर शहीदों की कोई कद्र होती तो दंतेवाड़ में नक्सली हिंसा में शहीद हुए छत्तीसगढ़ पुलिस के चार कर्मियों के शव कूड़ा ढोने वाली गाड़ीयां में नहीं लाए होते।

मुंबई में हुए आंतकी हमले में अपनी जान गंवाने वाले मेजर उन्नीकृष्णन के परिजनों ने बेटे की शहादत के बाद राजनीतिक दलों के मगरमच्छी आंसुओं और फौरी बयानबाजी से आजिज आकर मुख्यमंत्री को घर से खदेड़ दिया था। मध्य प्रदेश के जाबांज आईपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार सिंह की खनन माफियाओं ने हत्या कर दी थी। कर्तव्य की बलिवेदी पर चढ़े ईमानदार पुलिस अफसर की शहादत के बाद जो सियासत हुई उस पर उसके परिजनों ने हाथ जोड़ लिये थे। वास्तिवकता यह है कि नेताओं के जज्बात शायद मर चुके है, उनकी शिराओं में खून की बजाय पानी दौड़ता है और उनकी दृष्टि में किसी की शहादत का कोई मोल और सम्मान नहीं है। बटला हाउस इनकांउटर में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की शहादत पर जो ओछी और तुच्छ राजनीति हुई वो किसी से छिपी नहीं है।

सरकार की बेशर्मी, बेरूखी और संवेदनहीनता कई मौके पर सामने आ चुकी है। शहादत के वक्त बड़ी-बड़ी घोषणाएं और डींगे मारने वाले नेता बाद में पीछे पलटकर देखते भी नहीं है कि शहीद के परिजन किस हालत में हैं। भारत-पाक युद्व के हीरो और परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद की बीवी का कोई पुरसाहाल नहीं है। अपने पोते को मामूली सी नौकरी दिलवाने के लिए कई बार लखनऊ और दिल्ली के चक्कर काट चुकी हैं। कारगिल युद्व और संसद पर हुए हमले में शहीद सैनिकों के परिजन अब तक दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है। कई पूर्व सैनिक वीरता पदक और सरकार से मिले सम्मान को वापस लौटने की धमकीयां भी दे चुके हैं। पिछले साल नक्सलियों द्वारा हाल ही में सीआरपीएफ के जवान बाबूलाल पटेल को मौत के घाट उतारकर पेट चीरकर बम रख दिया गया था। शहीद बाबूलाल उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले का रहने वाला था। मुख्यमंत्री, केन्द्र और राज्य सरकार का कोई सक्षम अधिकारी आज तक शहीद के परिजनों के आंसू पोंछने नहीं गया है। इस मामले में भी राजनीति शुरू हो गयी थी।

जानकारों ने बताया कि देश के लिए शहीद होने वाले फौजी भाई के मा बाप, पत्नी और बच्चों को ही हक़ मिलेगा बाकी सब तो रिश्तेदार है सरकारी रिकॉर्ड में नोमीनी सिर्फ मा बाप और पत्नी बच्चे हकदार होता है तो फिर अन्य रिश्तेदारों का नाम भी नियुक्ति के दौरान सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने का नियम होना चाहिए लेकिन आजकल नेताओं को सिर्फ मौका चाहिए अपनी राजनीति चमकाने के लिए बाकी शहीद का परिवार तो वही था जहाँ पर पहले था l

आज भले ही सरकार शहीदों को उनकी बहादुरी के लिए दाद दे रही है क्योंकि हमारे राज्य में चुनाव आने वाले हैं, इसलिये समय का तकाजा है कि नेतागिरी का चक्का पूरे जोर से घूमे क्योंकि शहादत रोज-रोज नहीं होती और कभी-कभार ही सियासत चमकाने का मौका मिलता है। विपक्ष की नेता स्व सुषमा स्वराज एक के बदले पाक सैनिकों के दस सिर लाने की मांग करती थी तो वो भले ही उनकी मांग शहीद के परिजनों को मलहम लगाने का काम करती हो लेकिन असल में ये कोरी बकवास बाजी और ओछी राजनीति के सिवाय कुछ और नहीं था। बात-बात पर राजनीति करने वाले नेताओं और राजनीतिक दलों को शहीदों को पूरा मान-सम्मान देना चाहिए न कि उनकी शहादत पर सियासत करनी चाहिए क्योंकि शहीदों के कारण ही देश की सीमाएं, नागरिक और स्वतंत्रता कायम है
वन्दे मातरम ……

– राजस्थान से राजूचारण

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *