रमजान की आमद : इबादत, तकवा और समाजी जिम्मेदारी का मुकम्मल पैगाम -फ़ैज़ान अशरफ हामिदी

मौलाना फ़ैज़ान अशरफ हामिदी ( सम्भल) की मुसलमानों से अपील

सम्भल- रहमतों, बरकतों और गग़फ़िरत का पाक महीना रमजान शरीफ करीब है। यह महीना हर मुसलमान के लिए आत्म-सुधार, इबादत में इज़ाफ़ा और इंसानियत की ख़िदमत का सुनहरा मौक़ा लेकर आता है। रमजान हमें सिर्फ रोजा रखने का हुक्म नहीं देता बल्कि हमारी पूरी जिंदगी के निज़ाम को सुधारने की तालीम देता है। यह महीना सब्र, शुक्र, तक्रवा अख़लाक़ और सामाजिक हमदर्दी का जीता-जागता सबक़ है।

मौलाना फ़ैज़ान अशरफ हामिदी ने रमज़ान करीम की आमद पर शहर व क्षेत्र के मुसलमानों से अपील की कि वह इस महीने को सिर्फ रस्मी तौर पर न मनाएं, बल्कि इसकी असली रूह को समझें और अपने अमल से इसे जिंदा करें।

उन्होंने कहा कि रमजान कुरआन का महीना है। इस महीने में ज्यादा से ज्यादा तिलावत, तरावीह की पाबंदी, तहज्जुद, इस्तिग़फ़ार और दुआओं का एहतिमाम किया जाए। अपने घरों में दीन का माहौल बनाया जाए, बच्चों को रोज़े की अहमियत समझाऐं और घर वालों के साथ मिलकर इबादत का सिलसिला बढ़ाया जाए।

समाजी जिम्मेदारी का एहसास : मौलाना ने खास तौर पर समाजी जिम्मेदारी की तरफ ध्यान दिलाते हुए कहा कि रमजान का असली मक्रसद सिर्फ अपनी निजात नहीं, बल्कि समाज के कमजोर तबके को सहारा देना भी है। हमारे आसपास कई ऐसे
परिवार हैं जो आर्थिक तंगी, बीमारी या बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। कुछ लोग अपनी गुरबत को छुपाए रखते हैं, मगर उनकी जरूरतें साफ दिखाई देती हैं। ऐसे लोगों तक मदद पहुंचाना बहुत बड़ा सवाब है।

उन्होंने कहा कि जकात, सदका और फ़ितरा का सही इस्तेमाल किया जाए। पहले अपने मोहल्ले और बस्ती के गरीबों की पहचान की जाए। अगर हर शख़्स अपने आसपास के दो-चार जरूरतमंद परिवारों की जिम्मेदारी ले ले, तो पूरा समाज खुशहाल हो सकता है। रमजान में इफ्तार का सामान, राशन किट, दवाइयां, बच्चों के कपड़े और ईद की बुनियादी जरूरतें मुहैया कराना बेहद नेक काम है।

रोजाः सिर्फ भूख नहीं बल्कि एहसास : उन्होंने कहा कि रोज़ा हमें भूख और प्यास का एहसास कराता है, ताकि हम उन लोगों के दर्द को महसूस कर सकें जो साल भर तंगी में जीते हैं। अगर हमारे रोज़े हमें गरीबों के करीब नहीं लाते, तो हमें अपने इखलास का जायजा लेना चाहिए। रमजान आत्म मूल्यांकन का महीना है अपने गुनाहों से तौबा करने, रिश्तों को सुधारने और दिलों में मोहब्बत पैदा करने का वक्त है।

नौजवानों के लिए पैग़ाम:

मौलाना ने नौजवानों से अपील की कि वह रमजान को मोबाइल, टीवी,फिल्म और वेकार मशागिल में गंवाने के बजाय मस्जिदों में जुड़ें, तरावीह में हिस्सा लें और अपने बुजुर्गों की खिदमत करें। बच्चों को भी छोटी उम्र में रोज़े और नमाज की आदत डालना चाहिए ताकि उनमें दीन की मोहब्बत पैदा हो।

मौहल्ला स्तर पर पहल की जरूरत:
उन्होंन सुझाव दिया कि हर मौहल्ले में
एक छोटी कमेटी बनाई जाए जो खामोश तरीक़े से जरूरतमंदों की सूची तैयार करे और इज़्ज़त के साथ उनको मदद पहुंचाए। मदद देते वक्त उनके आत्मसम्मान का भी ख़्याल
जरूरी है। इस तरह की सामूहिक कोशिश से समाज में भाईचार ,भरोसा और एकता मजबूत होती है ।
आख़िर में मौलाना फ़ैज़ान अशरफ़ हामिदी ने दुआ की ,कि अल्लाह तआला इस रमजान शरीफ़ को हम सबके लिए हिदायत, बरकत और मग़फ़िरत का जरिया बनाए। हमें सच्चे दिल से इबादत करने अपने गुनाहों से तौबा करने और अपने आसपास के गरीब, मजलूम और यतीम लोगों की मदद करने की तौफीक आता फरमाए।
आइए, इस रमजान को सिर्फ एक धार्मिक परंपरा न रहने दें,इसे समाज की इस्लाह,इंसानियत की खिदमत और आपसी मोहब्बत का मजबूत आधार बनाऐं ताके हमारे शहर व मुल्क में अमन, रहमत,और ख़ुशहाली का माहौल कायम हो सके।

– सम्भल से सैय्यद दानिश

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