“ओरण बचेगा तो ही देश की सीमा बचेगी”: विधानसभा में रविन्द्र सिंह भाटी का तीखा प्रहार

राजस्थान/बाड़मेर- राजस्थान विधानसभा के बजट सत्र में शुक्रवार को राजस्व विषयों पर चर्चा के दौरान शिव विधायक रविन्द्र सिंह भाटी ने सीमांत राजस्थान की पीड़ा, पर्यावरणीय संकट, सामाजिक असुरक्षा और राष्ट्रीय सीमा की मजबूती से जुड़ा एक व्यापक प्रश्न खड़ा किया।

भाटी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज पूरे राजस्थान में यदि सबसे बड़ा लैंड बैंक कहीं है, तो वह बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर और फलौदी क्षेत्र में है और विडंबना यह है कि वही क्षेत्र आज अपनी ही जमीन, अपने ही ओरण–गोचर और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्षरत है।

अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हुए भाटी ने 1965 और 1971 के युद्धों, अकाल और प्राकृतिक आपदाओं के दौर को याद किया। उन्होंने कहा कि जब अंतरराष्ट्रीय सीमा को मजबूत करने की आवश्यकता थी, तब सीमांत क्षेत्रों के लोगों ने अपने शीश देकर देश की रक्षा की।

उन्होंने दावे के साथ कहा, “उस कठिन काल में सीमा को मजबूत करने का काम वहां के लोगों ने किया। अकाल में भी, प्राकृतिक बाधाओं में भी, देश को मजबूत करने का काम वहीं के लोगों ने किया। लेकिन आज उन्हीं लोगों के हालात क्या हैं?”उन्होंने पीड़ा व्यक्त की कि जिन जमीनों को पूर्वजों ने 700–800 वर्षों से बचाकर रखा, आज उन्हीं को बचाने के लिए अपने ही प्रदेश में संघर्ष करना पड़ रहा है।

भाटी ने सदन को आंकड़ों के साथ बताया कि राजस्थान में लगभग 25,000 ओरण हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल करीब 6 लाख हेक्टेयर है। मारवाड़ क्षेत्र के 9053 गांवों में 3017 ओरण हैं और केवल जैसलमेर में ही 100 प्रमुख ओरण स्थित हैं।

उन्होंने कहा कि ये ओरण केवल जमीन नहीं, बल्कि जल स्रोतों, तालाबों, आगोर क्षेत्रों और गोचर भूमि की जीवनरेखा हैं। गौवंश और सनातन परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, “अगर ये ओरण–गोचर खत्म हो गईं, तो हमारी गौवंश कहां जाएगी? हम देसी घी और देसी दूध की बात करते हैं, लेकिन अगर गोचर नहीं बचेंगे तो आने वाली पीढ़ियां तरसेंगी, क्यूंकि वह देसी घी पश्चिमी राजस्थान के इन्हीं इलाकों से आता है।”

सभापति के पीछे लगी महात्मा गांधी की तस्वीर की ओर संकेत करते हुए भाटी ने कहा कि जिस देश ने अहिंसा और संरक्षण की शिक्षा दी, वहीं आज ओरणों को समाप्त किया जा रहा है।
उन्होंने लोक कहावत उद्धृत की “घी ढुले तो कुछ नहीं, पर पानी ढुले तो जीव बले” — यह बताते हुए कि ओरणों में स्थित तालाब और आगोर पूरे पारिस्थितिक तंत्र को जीवित रखते हैं एवं पश्चिमी राजस्थान में इस पानी का क्या महत्व है।

भाटी ने सरकार से तीखा प्रश्न किया कि जब हर विभाग — यहां तक कि आबकारी विभाग — की स्पष्ट नीति है, तो भूमि आवंटन के लिए समग्र नीति क्यों नहीं?

उन्होंने कहा कि पहले भूमि आवंटन से पहले पंचायत से एनओसी ली जाती थी, फिर यह अधिकार एसडीएम को गया, फिर कलेक्टर को, और अब सीधे जयपुर से अनुमति दी जा रही है।

उन्होंने पूछा, “यह जमीन किसकी है साहब? आप हर कैबिनेट बैठक में जमीन अलॉट कर रहे हैं। विकास के नाम पर लोगों का गला क्यों घोंटा जा रहा है? रामगढ़ में एक निजी कंपनी को दी गई भूमि का उल्लेख करते हुए भाटी ने कहा कि उस आवंटन से 80 घर प्रभावित हुए।“वे लोग कहां जाएंगे? उनकी बात कौन करेगा? वो वही लोग हैं जिन्होंने भारत माता के लिए सीमा को मजबूत किया। लेकिन आज उनकी परवाह किसे है?” — यह कहते हुए उन्होंने सरकार को कटघरे में खड़ा किया।

भाटी ने 4 अगस्त 1980 की अधिसूचना के तहत घोषित डेजर्ट नेशनल पार्क का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि एक तरफ लाखों बीघा भूमि कंपनियों को दी जा रही है, वहीं डीएनपी क्षेत्र के लोग पिछले 45 वर्षों से मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।उन्होंने बताया कि वहां सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल, मोबाइल नेटवर्क जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना तक लागू नहीं हो पा रही। आबादी विस्तार एक प्रतिशत भी नहीं हुआ। लोगों को केसीसी नहीं मिल सकती।
“एक तरफ आप जमीन दे रहे हैं, दूसरी तरफ जो लोग 45 साल से उम्मीद लगाए बैठे हैं, उनकी चिंता कौन करेगा?”

भाटी ने राघवा, सेउआ, जोगा, तेजपाड़ा, सोनू, सांखला, सुल्ताणा, अर्जुना, घंटियाली, रामला, साधना, भोजराज जी की ढाणी, हेमा, नेतसी, पारेवर, रोहिड़ी, पांचला, मोती की बेरी, सुंदरा, हटार, लूणार, फुलिया, करड़ा और पोछीणा जैसे गांवों का नाम लेते हुए कहा कि ये गांव पलायन की कगार पर हैं।उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सीमांत क्षेत्र खाली होते गए, तो यह केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सीमा की मजबूती का प्रश्न होगा।

भाटी ने बावरी, गाड़िया लोहार, बंजारा, गवारिया, कालबेलिया, जोगी, भाट, रबारी, रायका, गरड़िया और सरगरा समाज का उल्लेख करते हुए कहा कि कंपनियों को लाखों बीघा जमीन दी जा रही है, लेकिन इन घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समाजों को बसने के लिए भूमि तक नहीं मिल रही। सोलर परियोजनाओं, हाई टेंशन लाइनों और औद्योगिक परियोजनाओं का जिक्र करते हुए भाटी ने कहा कि किसान मजबूर है और उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही।

उन्होंने सरकार से पूछा, “ऐसा कौन सा दबाव है मल्टीनेशनल कंपनियों का कि सरकार घुटनों पर बैठी है? प्रदेश को गिरवी क्यों रखा जा रहा है?” राजस्थान की पहचान खेजड़ी वृक्ष पर सरकार की घोषणाओं को अपर्याप्त बताते हुए उन्होंने कहा कि यदि सरकार सच में प्रतिबद्ध है, तो अध्यादेश लाए और कठोर दंड का प्रावधान करे।“सिर्फ आदेश निकाल देने से पेड़ नहीं बचेंगे। कलेक्टर किस आधार पर रोकेंगे? जुर्माना वही का वही है। एक प्रतिशत भी कटाई नहीं रुकी है।” — उन्होंने कहा।

अपने वक्तव्य के अंत में भाटी ने कहा कि यह विषय किसी एक दल का नहीं, बल्कि सीमा की मजबूती और प्रदेश की अस्मिता का है।

उन्होंने आग्रह किया कि:
• ओरण–गोचर संरक्षण के लिए विशेष नीति बने
• अनैतिक भूमि आवंटन रोका जाए
• डीएनपी क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित हों
• पलायन रोकने के लिए विशेष पैकेज आए
• खेजड़ी संरक्षण पर स्पष्ट कानून बनाओं

उन्होंने चेतावनी दी, “अगर सीमांत क्षेत्र के लोग आगे आ गए, तो जयपुर की सड़कें जाम हो जाएंगी। कंपनियों के आगे घुटने मत टेकिए। मजबूती से निर्णय लीजिए, हम साथ हैं।”

– राजस्थान से राजूचारण

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