राजस्थान/बाड़मेर- कुछ दिन पहले मुझे जेल की तलाशी के लिए एक टीम के साथ जाना हुआ। यह एक सामान्य प्रक्रिया थी, लेकिन उस दिन जो अनुभव हुआ, उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया।
हम एक बैरक में पहुंचे और मैंने अपने एक सहयोगी को पश्चिमी दीवार के दाहिने कोने की तलाशी लेने को कहा। तभी वहां बैठे एक कैदी ने तुरंत टोक दिया – “साहब, जूते उतार देना।” मैंने गौर से उस कोने की ओर देखा, तो पाया कि वहां मां दुर्गा की तस्वीर रखी थी और पास में घट स्थापना की गई थी। नवरात्र चल रहे हैं।
इसके बाद मैंने बैरक की दीवार के बाएं कोने की तलाशी के लिए दूसरे सहयोगी को निर्देश दिया। तभी वहां बैठे एक व्यक्ति ने हाथ जोड़ते हुए कहा – “साहब, रुकिए।” यह कहते हुए उसने दीवार में ऊंची टंगी हुई एक कपड़े की थैली को उतारकर अपनी हथेलियों पर रखा और अलग खड़ा हो गया।
मैंने अनुमान लगाया कि इसमें कोई धार्मिक ग्रंथ हो सकता है। कुछ क्षण रुककर मैंने पूछा – “क्या इसमें कुरान शरीफ है?” उसने सिर झुकाकर जवाब दिया – “जी साहब, रमज़ान चल रहा है।” उस क्षण मेरे भीतर कई विचार उमड़ने लगे।
जेल के अंदर जो मुमकिन है, वो बाहर क्यों नहीं?
मैंने देखा कि जेल के एक ही बैरक में, एक ही दीवार के दो कोनों में, बिना किसी दीवार या पर्दे के, शांति से पूजा और इबादत हो रही थी। कोई विवाद नहीं, कोई मतभेद नहीं। वहीं दूसरी ओर, बाहर की दुनिया में, जहां धार्मिक स्थल दूर-दूर हैं, वहां त्योहारों के दौरान पुलिस बल की तैनाती करनी पड़ती है।
कई दिनों तक इस घटना पर सोचता रहा और फिर मुझे एहसास हुआ – अंदर और बाहर के हालातों का अंतर ‘वोट’ है। दोनों मतदाता तो है परन्तु जेल में बंद कैदियों के पास मताधिकार नहीं है। वहां कोई राजनीतिक ध्रुवीकरण नहीं, कोई धर्म के नाम पर वोटों की राजनीति नहीं। इसलिए वहां बिना किसी डर या संघर्ष के, पूजा और इबादत एक साथ हो रही थी।
क्या हम बाहर भी ऐसी एकता बना सकते हैं?
इस घटना ने मेरे मन में यह सवाल खड़ा किया – क्या हम जेल से बाहर भी इसी सद्भावना को अपना सकते हैं? क्या हम राजनीति से ऊपर उठकर एक-दूसरे के विश्वासों का सम्मान कर सकते हैं?
शायद जवाब हमारे ही हाथ में है। अगर हम मतभेदों से ऊपर उठकर एक-दूसरे के विश्वासों का आदर करना सीख जाएं, तो समाज में भी वही शांति और भाईचारा देखने को मिलेगा, जो मैंने जेल की उस बैरक में देखा था।
– राजस्थान से राजूचारण