आज एक बहुत पुरानी बात याद आ गई. क्यों आई, यह आगे चलकर बता दूंगा यह शायद अस्सी नब्बे के दशक की बात है, दो-चार-पांच बरस इधर उधर भी रहे हों तो बात में कोई फर्क़ नहीं पड़ने वाला l
उन दिनों दिल्ली के एक प्रकाशक को धंधा करने का एक नया तरीका सूझा था l वह एक साल में आठ दस संकलन प्रकाशित करता था जिनके शीर्षक कुछ इस तरह होते थे- दुनिया के सौ श्रेष्ठ विद्वान, दुनिया के सौ श्रेष्ठ कलाकार, दुनिया के सौ श्रेष्ठ साहित्यकार, भारत के दो सौ श्रेष्ठ कवि, भारत के सौ श्रेष्ठ शिक्षक, वगैरह. वह प्रकाशक इस तरह हर श्रेणी के कुछ चुनिंदा लोगों के बारे में जानकारी एकत्रित करता और उस जानकारी को कम्पोज़ करके उसकी एक चिप्पी प्रिण्ट करके सम्बद्ध ‘विद्वान’, हस्ती को एक पत्र के साथ भेजता और पत्र में लिखा होता कि “आपका विवरण इस शीर्षक की पुस्तक में प्रकाशित किया जा रहा है।
प्रकाशनोपरांत इस पुस्तक का मूल्य आठ सौ रुपये होगा, लेकिन अगर आप अभी अग्रिम राशि भेज कर इसकी बुकिंग करवाते हैं तो यह आपको आधे मूल्य पर दी जाएगी”. जो विवरण वह प्रकाशक प्रकाशित करने की बात करता उसे जुटाने की प्रक्रिया यह होती कि वह आपको एक पत्र भेजता कि हमने आपका चुनाव दुनिया के सौ श्रेष्ठ विद्वानों/ कलाकारों (या जो भी श्रेणी हो, उस) में किया है।
आपसे अनुरोध है कि कृपया अपना पूरा परिचय एक चित्र के साथ हमें भेज दें. इसी परिचय को वह कम्पोज़ करके सम्बद्ध व्यक्ति के पास भेज देता था. यह जो पत्र वह प्रकाशक भेजता इसी के साथ एक और अनुरोध होता. अनुरोध यह कि भविष्य में हम अमुक श्रेणी के विद्वानों की एक किताब प्रकाशित कर रहे हैं । अगर आप उसके लिए कुछ नाम सुझा सकें तो हम आपका आभार मानेंगे. इस तरह उस प्रकाशक के पास भावी विद्वानों/विशेषज्ञों की सूची तैयार होती रहती और उन्हें भी उसके पत्र मिलते रहते। उस समय मैं जिस महाविद्यालय में कार्यरत था वहां भी अनेक संकाय सदस्यों के पास इस आशय के पत्र आ चुके थे और उनमें से कुछ इस बात से कि उन्हें दुनिया के श्रेष्ठ लोगों में शुमार किया जा रहा है, बहुत गर्वित भी थे।
यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं कि मेरे पास भी ऐसे कम से कम पंद्रह बीस पत्र तो आए ही थे.अब स्वीकार करता हूं कि मैंने हर पत्र का जवाब दिया. अपना परिचय मय चित्र के भेजा. लेकिन साथ ही यह भी लिखा कि जब किताब छप जाएगी तो उसे खरीद लूंगा. बताने की ज़रूरत नहीं, फिर भी बता देता हूं कि अगर खरीदनी ही होती तो आधी कीमत पर ही खरीद लेता. मुझे तब भी इस सारे उपक्रम की विशुद्ध व्यावसायिकता समझ में आ रही थी, लेकिन हमारे बहुत सारे मित्र थे जिनका यह सोच रहा होगा कि वे वाकई बहुत महान हैं, या कम से कम इस तरह की पुस्तक में छप जाने के बाद तो उन्हें महान मान ही लिया जाएगा. बहुत सारे मित्र प्रयत्नपूर्वक अखबारों में इस आशय की ख़बरें भी छपवाते रहते थे कि उनका चयन देश के या दुनिया के श्रेष्ठ एक सौ विद्वानों/लेखकों/प्रशासकों/कलाकारों में हुआ है. मुझ जैसे मज़ाक पसंद लोग इस तरह की ख़बरें छपवाने वाले भोले दोस्तों को बधाई देकर उन्हें चने के झाड़ पर चढ़ाने से भी बाज नहीं आते थे. मुझे बहुत मज़ा तब आया जब कई बरस बाद एक बार मेरे विभागीय मंत्री जी की टेबल पर इसी तरह का एक पत्र देख कर उन्हें बधाई दी तो उन्होंने बड़े मुदित भाव भाव से मेरी बधाई को स्वीकार कर मुंह भी मीठा करवाया !
जैसा मैंने पहले लिखा है, मेरे महाविद्यालय के कुछ साथी इस तरह का प्रस्ताव पाकर बहुत गर्वित थे और वे हर मिलने-जुलने वाले को यह बताने से नहीं चूक रहे थे कि उनका चयन दुनिया के श्रेष्ठ विद्वानों में हुआ है. यह देख मुझे एक शरारत सूझी. जब ऐसा ही एक पत्र मेरे पास फिर से आया और उस पत्र के साथ संलग्न पत्र में मुझसे कुछ और विद्वानों के नामों का सुझाव मांगा गया, तो मैंने अपने महाविद्यालय के सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के नामों के साथ-साथ प्राचार्य जी के पालतू श्वान का नाम भी लिखकर भेज दिया. इसके बाद जो होना था वही हुआ. लगभग एक सप्ताह बाद हमारे स्टाफ रूम में रखे रहने वाले डाक के डिब्बे में सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के नाम लिखे एक जैसे लिफाफे नज़र आए. कहना अनावश्यक है कि एक लिफाफे पर प्राचार्य जी के श्वान का नाम भी था. ये सब भी दुनिया के चुनिंदा विद्वानों की जमात में शामिल हो चुके थे !
और अब यह बता देता हूं कि आज यह बात क्यों याद आई!
हुआ ऐसा कि दो-चार दिन पहले कहीं एक समाचार देखा कि अमुक संस्था दो महीने बाद एक सम्मान समारोह आयोजित कर रही है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों की उत्कृष्ट प्रतिभाओं को सम्मानित किया जाएगा. उस समाचार में एक सम्पर्क सूत्र भी दिया गया था. मैंने सहज जिज्ञासावश (या क्या पता मेरे मन में भी सम्मानित होने की आकांक्षा ने सर उठाया हो!) उस सूत्र पर सम्पर्क कर जानकारी मांग ली. आज मेरे पास एक कॉल आया. बात करने पर पता चला कि कॉल उसी सम्मान करने वाली संस्था की तरफ से है. एक महिला बोल रही थीं. पहले उन्होंने मुझसे मेरा परिचय लिया और फिर अपनी ‘सम्मान ‘योजना’ के बारे में बताया. उनकी बात सुनते हुए मुझे लग रहा था कि मुद्दे की बात अभी तक आई नहीं है. इसलिए मैं हुंकारा भरते हुए उनकी बातें सुनता रहा. पहले उन्होंने यह बताया कि सम्मान समारोह किस तरह आयोजित होगा और उससे सम्मानित होने वाले को क्या-क्या लाभ होंगे! जो उन्होंने बताया वह किसी भी सम्मानाकांक्षी को आकर्षक लग सकता था. राज्य की राजधानी में सम्मान समारोह, किसी पद्मश्री के कर कमलों से सम्मान, मीडिया कवरेज, फोटोग्राफ़ी और वीडियोग्राफ़ी, लंच, एक अतिथि साथ लाने की अतिरिक्त सुविधा आदि. इसके बाद उन्होंने सम्मान के लिए आवेदन की प्रक्रिया बताई, और आखिर में यह बताया कि जब वे लोग प्राप्त आवेदनों में से सम्मान प्राप्त करने वालों का चयन कर लेंगे तो चुने हुए लोगों को इस आशय की सूचना दे दी जाएगी. इसके बाद -ख़ास बात तो यह थी- कि हर चयनीत व्यक्ति को पंद्रह बीस हज़ार रुपये संस्था के खाते में डोनेशन के रूप में जमा कराने होंगे. इसके बाद ही सम्मान की विधिवत घोषणा होगी ! मैंने उनसे अनुरोध किया कि यह सूचना वे मुझे वॉट्सएप पर भेज दें ताकि मैं उनके प्रस्ताव पर विचार कर सकूं.कुछ देर बाद उनकी विस्तृत सूचना मुझे मिल भी गई!
सोच रहा हूं कि पंद्रह हज़ार रुपये में सम्मान करवाना चाहिए या फिर नहीं ? यह भी सोच रहा हूं कि बजाय औरों से अपना सम्मान करवाने के मैं ख़ुद क्यों न औरों का सम्मान करना शुरू कर दूं ? अगर बीस लोग भी अपना सम्मान करवाने के लिए तैयार हो गए तो मुझे तीन लाख रुपये मिल जाएंगे. एक लाख रुपये में सम्मान समारोह आयोजित हो जाएगा. दो लाख की शुद्ध बचत मुझे हो जाएगी! फिर अगर ज़रूरी लगा तो पंद्रह बीस हज़ार रुपये का चन्दा किसी ओर संस्था को देकर अपना भी सम्मान करवा लूंगा ! और इसमें आपकी क्या राय है मान सम्मान करने के लिए प्रशस्ति पत्र लेने की हा या फिर ना ?
– राजस्थान से राजूचारण
