राजस्थान- राजस्थानी में कहावत है जहाँ पानी गहरा होता है ,लोग उतने ही गहरे होते है। कुछ अपवाद भी होंगे।लेकिन अब पानी सतह पर भी है। दुआ करते है यह गहराई अक्षुण रहेगी। जब भी मिलतें यही अपनापन से गले लगा कर हमेशा हौसला अफ़ज़ाई करते थे, काम कोई भी करें लेकिन मन लगाकर करेंगे तो लोग आपके जाने के बाद में भी आजीवन याद करेंगे ये
आज सुबह एक बेहद दुखद समाचार मिला—राजस्थान के जाने- माने वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ अब हमारे बीच नहीं रहे। पिछले कुछ समय से वे जयपुर में अस्वस्थ चल रहे थे, लेकिन उनके जाने की खबर सुनकर ऐसा लगा जैसे राजस्थान की पत्रकारिता का एक सशक्त और संवेदनशील अध्याय अचानक बंद हो गया हो।
नारायण बारेठ उन विरले पत्रकारों में थे जिनकी कलम केवल खबर लिखने के लिए नहीं चलती थी, बल्कि समाज के दबे-कुचले और वंचित लोगों की आवाज़ को ताकत देने के लिए चलती थी। उन्होंने अपनी पूरी पत्रकारिता में हमेशा आम आदमी के पक्ष को मजबूती से रखा। दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, महिलाओं और समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के मुद्दों को उन्होंने लगातार अपनी लेखनी के केंद्र में रखा।
अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत उन्होंने जोधपुर से की थी। नवभारत टाइम्स में उनकी अद्भुत पत्रकारिता को आज भी याद किया जाता है।प्रतिभा, मेहनत और निष्पक्ष दृष्टि के कारण वे बहुत जल्दी पूरे राजस्थान में पहचाने जाने लगे। बाद में बीबीसी, द एशियन एज और द पायनियर जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों से जुड़कर उन्होंने अपनी पत्रकारिता को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि वैश्विक पहचान दिलाई। उनकी पहचान एक ऐसे पत्रकार की रही जो बेबाक भी था, निष्पक्ष भी और जन पक्षधर भी।
पत्रकारिता के साथ-साथ उन्होंने शिक्षा जगत में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। जयपुर स्थित हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में उन्होंने नई पीढ़ी के पत्रकारों को मार्गदर्शन दिया। उनके छात्र अक्सर कहा करते थे कि बारेठ जी केवल पत्रकारिता नहीं पढ़ाते थे, बल्कि पत्रकारिता की आत्मा समझाते थे—सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता।
बाद में उन्हें राजस्थान का सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया। जब उन्होंने इस पद का कार्यभार संभाला था, तब मुझे उन्हें शुभकामनाएँ देने का अवसर मिला। उस समय उन्होंने बड़ी सरलता से कहा था “अमरपालजी, यह बहुत महत्वपूर्ण पद है। यह जनता के अधिकारों की रक्षा करने वाला पद है। मैं इसमें पूरी ईमानदारी से काम करूंगा।”
उन्होंने जो कहा, उसे सचमुच करके भी दिखाया। सूचना आयोग में वर्षों से लंबित पड़े सैकड़ों मामलों और अपीलों के निस्तारण के लिए उन्होंने तेज़ी से काम शुरू किया। केवल जयपुर मुख्यालय तक सीमित रहने के बजाय उन्होंने राज्य के विभिन्न जिलों में विशेष शिविर और सुनवाई आयोजित की। इससे आम लोगों को जयपुर तक बार-बार चक्कर लगाने से राहत मिली और सूचना के अधिकार कानून के तहत लंबित अपीलों का तेजी से निपटारा हुआ।
सूचना आयुक्त के रूप में उनके कई फैसले ऐसे रहे जो आज उदाहरण के रूप में याद किए जाते हैं। उन्होंने हमेशा पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता के अधिकारों को सर्वोपरि रखा।
नारायण बारेठ का व्यक्तित्व भी उतना ही सरल था जितनी उनकी पत्रकारिता सशक्त थी। वे एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से उठकर पत्रकारिता के शिखर तक पहुंचे, लेकिन इस उपलब्धि का अहंकार उन्हें कभी छू भी नहीं पाया। वे हमेशा बेहद सहज, विनम्र और आम आदमी की तरह ही रहते थे। शायद यही वजह थी कि उनकी कलम में वह सच्चाई और संवेदना दिखाई देती थी जो सीधे लोगों के दिल तक पहुँचती थी। आज उनके जाने से न केवल राजस्थान की पत्रकारिता को अपूरणीय क्षति हुई है, बल्कि समाज ने भी एक ऐसे निर्भीक और संवेदनशील स्वर को खो दिया है जो हमेशा सत्ता से सवाल पूछता था और आम आदमी के अधिकारों के लिए खड़ा रहता था। पत्रकारिता के इस सजग प्रहरी को विनम्र श्रद्धांजलि। नारायण बारेठ जी को शत-शत नमन।ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और परिवार व उनके सभी चाहने वालों को इस कठिन समय में संबल दें। 🙏
एक मुट्ठी अनाज बाजरे ने विश्व पटल पर सुर्खियां बटोरी : नारायण बारेठ
उसे लगा राजस्थान महज एक मुट्ठी बाजरे ज्यादा कुछ नहीं है। शेरशाह सूरी ने जब राजस्थान पर कब्जे के लिए जंग छेड़ी , राजा मालदेव के रण बाँकुरे योद्धाओ ने उसकी फौज को नाकों चने चबवा दिए। 1544 की बात है। मरुस्थल में दोनों सेनाओ के बीच जम कर मैदान ए जंग हुई। सूरी मैदान छोड़ ही रहा था कि मालदेव के दो प्रमुख सेनानी राव जैता और कुम्पा शहीद हो गए। सूरी जीत गया। लेकिन जाते जाते बोला ‘ खेर करो ,वर्ना एक मुट्ठी बाजरे के लिए मैं दिल्ली की बादशाहत खो देता !
आज हमारे यहां पर राजस्थान दिवस है। यह सूरी की ना समझी थी। राजस्थान एक मुट्ठी बाजरा नहीं है। इस विकट मरुस्थल ने संसार को न केवल बहादुर योद्धा दिए है बल्कि उद्योग व्यापार को नामवर हस्तिया भी दी है। बियाबान सहरा ने सदियों तक फनकार और गुलकारो की परवरिश की है और संगीत को अपने सीने से सहेजे रखा है। इसकी वास्तु कला को देख कर लोग सम्मोहित हो जाते है। चटक रंगो से आभा मंडित धरती का यह टुकड़ा ऐसे लगता है गोया कुदरत ने खुद कूंची चलाई हो।
दुनिया 1944 में विश्व बैंक की अवधारणा से रूबरू हुई। पर राजस्थान के मानिकचंद बंगाल व्यापार करने जाकर कोई तीन सो साल पहले ‘जगत सेठ’ कहलाये। कहते है उनकी कोठी ऐसे लगती थी जैसे इंग्लॅण्ड का इम्पीरियल बैंक। जगत सेठ के लिए क्या राजा ओर क्या नवाब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी लेंन देंन किया था।यह बताता है एक मुट्ठी बाजरे में कितनी ताकत होती है। आसाम में ज्योति प्रसाद अग्रवाल का दर्जा वैसा ही है जैसा बंगाल में रविन्द्र नाथ टैगोर का है। वे कभी राजस्थान से आसाम जाकर बसे थे। आसाम में सिनेमा ,नाटक और साहित्य में उनसे बड़ा कोई नाम नहीं है। राज्य सरकार हर साल उनकी याद में शिल्पी दिवस मनाती है। सरकारी छुट्टी होती है। पूरे दिन भिन्न-भिन्न आयोजन होते है।
रोबर्ट ब्लैकविल तीन साल भारत रहे। वे भारत में अमेरिका के राजदूत होकर आये थे। भारत उनको इतना भा गया कि एक मौके पर भारत मेरी मां कह गए। ब्लैकविल भारत की सहिषुणता ,उदारता ,विविधता और बहुलवादी समाज के कायल होकर लौटे। लेकिन इन सब के बीच राजस्थान ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। वे पश्चिम इलाके में पाकिस्तानी सरहद पर बसे जैसलमेर को देख कर अभिभूत हो गए। कहने लगे जयपुर ,उदयपुर ,जोधपुर सब अच्छे है। पर मेरा सबसे पसंदीदा स्थान तो जैसलमेर है। उन्होंने फाइनेंसियल टाइम्स में अपने ये भाव व्यक्त किये।
” मुझे लगता है कुछ राते तो ऐसी होती है जब दुनिया के सारे सितारे सिर्फ जैसलमेर के आसमां में ही नमूदार होकर उसे जगमग रखते है। हैरान हूँ अब तक किसी यूरोपीय मुल्क ने सितारे चुराने के लिए जैसलमेर पर मुकदमा क्यों नहीं किया – ब्लैकविल
