राजस्थान/बाड़मेर – गर्मियों के मौसम में जहाँ सड़को पर डामर ही आग उगल रहा है इस दौरान ही मानव जीवन की सेवा में कोई भी सगठन, सस्था और व्यक्तियों का समूह मिलकर कोई भी पानी पिलाने का नेक कार्य करते हैं तो उनके इस जीवन में सभी सकट जरूर मिटते है ऐसे हमारे शास्त्र में भी लिखा गया था। गर्मीयों के मौसम में उपखंड क्षेत्र में पानी की किल्लत न हो इसके लिए धरातल पर अवलोकन करने पहुंचे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी और बाड़मेर उपखंड अधिकारी यथार्थ शेखर ने बताया कि पहले पश्चिमी राजस्थान में पानी की बहुत कमी होती थी और ग्रामीण क्षेत्रों में लोग पानी को सहेजने वाले टांके पर ताला लगाकर रखा करते थे और आजकल अथाह खनिज पदार्थों के मिलने से विश्व पटल पर बाड़मेर जैसलमेर शुमार हो गया है।चाहे आप देश दुनिया में कहीं पर भी हो बाड़मेर जैसलमेर का नाम सुनते ही चेहरे पर एक अलग मुस्कान आती है पहले के बाड़मेर जैसलमेर और आजकल वही क्षेत्र चहुंमुखी विकास के क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
शेखर ने बताया कि बाड़मेर जैसलमेर में पहले पानी का अभाव रहता था, पुराने जमाने से ही लोगों ने प्याऊ की परंपरा का खास तौर पर पालन किया जाता था, बड़े आकार के मिट्टी के घड़े जिन्हें “मूंण” कहते हैं (जिसमें एक बार में करीब 50-70 लीटर पानी भरा जा सकता है). कई मूंणे जगह जगहों पर सिरकियों की प्याऊ बनाकर उसमें रेत बिछाकर रखी जाती थी, उन मूंणों को लोग स्वेच्छा से जल स्रोतों से पीतल/ तांबे की चरी या बड़े कलश (लंबी सुराहीदार गर्दन वाले) भरकर जल लाकर भरते थे, और कई लोग पैसा देकर जल भरवाने का पुण्यकाम करते थे। फिर वहाँ प्याऊ पर किसी बुजुर्ग महिला पुरुष या जरूरतमंद या निशक्तजन को बिठाया जाता था जो कि सभी राहगीरों को तांबे के बड़े झारे (लंबी नली वाला पात्र) से जल पिलाकर तृप्त करते थे। कई प्याऊऔ पर राहगीरों को पानी पिलाने से पहले गुड़ के टुकड़े भी खिलाये जाते थे और फिर पानी पिलाया जाता था, लेकिन आजकल छोटे बड़े शहरों में ठन्डे पानी की मटके की जगह पर प्लास्टिक वाले केम्परो द्वारा मीठा पानी की प्याऊ लगाकर पिलाया जाता है।
राज्य सरकार द्वारा गाँवों में पाइपलाइनों और हैड पम्पों द्वारा जलापूर्ति की जाती है।भारतीय प्रशासनिक के सेवा अधिकारी और बाड़मेर उपखंड अधिकारी यशार्थ शेखर ग्रामीण इलाकों में स्वयं हैंडपंप चलाकर पानी की उपलब्धता की जांच करते हुए।
— राजस्थान से राजूचारण
