बरेली- कल देर रात काज़ी-ए-हिन्दुस्तान मुफ्ती मुहम्मद असजद रजा़ खां का़दरी की सदारत में वक्फ जायदाद की सुरक्षा और इसके संवैधानिक अधिकारों को लेकर विश्व में सूफिज़्म का केंद्र बरेली मरकज़ में एक अहम बैठक हुई । इस बैठक में उलेमा किराम, वकीलों व कोर कमेटी के पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया।
बैठक में काज़ी-ए-हिन्दुस्तान मुफ्ती मुहम्मद असजद रजा़ खां का़दरी ने कहा कि हमारे बुजुर्गों ने अपनी कीमती जायदादें अल्लाह की राह में वक़्फ़ की थीं ताकि वे हमेशा के लिए धार्मिक, शैक्षिक और कल्याणकारी उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त हों। भारतीय संविधान के तहत हमें अपनी वक़्फ़ संपत्तियों की सुरक्षा और उनके सही उपयोग का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
बिल के संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक प्रभावों पर अपने विचार व्यक्त किए। बैठक में काज़ी-ए-हिन्दुस्तान ने कहा कि यह बिल संशोधन के नाम पर साजिश है जब कानून सबके लिए बराबरी का न हो तो वह पक्षपाती बन जाता है और आगे प्रमुख बिन्दुओं पर ज़ोर दिया :
संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन : उन्होंने कहा कि वक्फ बिल संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत मुसलमानों को प्राप्त धार्मिक मामलों के प्रबंधन के अधिकार का उल्लंघन करता है। वक्फ संपत्ति अल्लाह के नाम पर निहित एक धार्मिक संपत्ति है, जो इस्लामी परंपरा में सादका जारिया, दान और समुदाय कल्याण के मूल्यों का प्रतीक है। बिल को सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों के खिलाफ एक असंवैधानिक प्रयास बताया गया।
अनुच्छेद 25 और 26 का हनन : आगे कहा कि यह बिल संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और प्रबंधन के अधिकारों के खिलाफ़ है।
राज्य के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण : क़ाज़ी ए हिंदुस्तान ने तर्क दिया कि बिल अनुच्छेद 246(3) के तहत राज्य के विशेष विधायी अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करता है, जिसके कारण यह असंवैधानिक है।
वर्गीकरण और विभाजन की आशंका : बिल के खंड 3(ix) पर चर्चा करते हुए कहा गया कि अगाखानी वक्फ और बोहरा वक्फ जैसे उप-समूहों का निर्माण संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों से परे है और इससे समुदाय में विभाजन की संभावना बढ़ती है।
न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल : यह चिंता व्यक्त की कि संपत्ति के स्वामित्व विवाद को केवल सिविल कोर्ट ही तय कर सकता है, न कि राज्य सरकार के अधिकारी, जैसा कि बिल में प्रस्तावित है। यह प्रावधान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
समानता के अधिकार का उल्लंघन : बैठक में यह तथ्य उजागर हुआ कि बिल अनुच्छेद 14 के तहत समान संरक्षण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है। जहाँ हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध endowment को संरक्षण प्राप्त है, वहीं मुस्लिम वक्फ के लिए समान सुरक्षा नहीं दी गई है। उपयोग के आधार पर वक्फ को समाप्त करना और गैर-मुस्लिमों द्वारा इसके प्रशासन की व्यवस्था असमानता को दर्शाती है।
विवादित संपत्ति का उदाहरण : बैठक में मुंबई के एंटीलिया मामले का उल्लेख हुआ, जो पहले खोजा समुदाय की वक्फ संपत्ति थी और अब सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। यह सवाल उठाया गया कि क्या बिल के जरिए सरकार विवादित वक्फ संपत्तियों को प्रभावित करने का प्रयास कर रही है।
उलेमा किराम ने कहा कि बैठक का मुख्य उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के संरक्षण, प्रबंधन और इसके कानूनी पहलुओं पर विचार-विमर्श करना, खासकर वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 के संदर्भ में जो कल ही में संसद में पारित हुआ है l उलेमा किराम के साथ साथ वकीलों ने भी सख्त लफ़्ज़ों मे बिल की मजम्मत की और कहा कि जो शरीयत के खिलाफ़ हों l उसको हम नही मानते हैं l
जमात रज़ा ए मुस्तफ़ा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सलमान हसन खान (सलमान मिया) ने कहा कि हम भारत के नागरिक हैं l हमे भारतीय संविधान अपने मौलिक अधिकारों के तहत वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए अपनी आवाज बुलंद करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है l संविधान का अनुच्छेद 25 और 26 हमें धार्मिक स्वतंत्रता और अपनी धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार देता है, जिसमें वक्फ संपत्तियों का संरक्षण भी शामिल है। इसके साथ ही, अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार और अनुच्छेद 21 सम्मानजनक जीवन का अधिकार सुनिश्चित करता है। भारतीय संविधान किसी भी व्यक्ति या समुदाय के मौलिक अधिकारों के हनन की अनुमति नहीं देता, और वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण या दुरुपयोग इसी संवैधानिक भावना के खिलाफ है। वक्फ संपत्तियाँ हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग हैं।
सलमान मिया ने बताया बैठक में यह निर्णय लिया गया कि इस मुद्दे को जनता के समक्ष लाने के लिए देशभर में जागरूकता अभियान चलाया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर कानूनी कार्रवाई पर भी विचार किया जाएगा और जल्द ही क़ाज़ी ए हिंदुस्तान के आदेश पर देशभर के प्रमुख उलेमा किराम की बैठक बुलायी जाएगी।
– बरेली से तकी रज़ा