उमड़ती भीड़ से रायता तो फैलेगा लेकिन….

*गहलोत सरकार की तारीफ करना पायलट की विवशता है सरकार

बाड़मेर/राजस्थान- असंतुष्ट नेता सचिन पायलट को भले ही सीएम की कुर्सी नही मिलीं , लेकिन उनकी ताबड़तोड़ यात्राओं ने गहलोत खेमे में भारी बेचैनी पैदा कर दी है । लगता है प्रदेश के विभिन्न इलाकों के जरिये पायलट जमकर रायता बिखेरने में सक्रिय है । इनकी सभाओं में उमड़ती भीड़ भविष्य का नजारा पेश कर रही है ।

सचिन पायलट की सभाओं में उम्मीद से ज्यादा भीड़ आ रही है । लेकिन वे सरकार पर हमला करने से बच रहे है । उनकी विवशता है कि उन्हें प्रदेश के भ्रस्टाचार पर भी बोलना है तो साथ मे अशोक गहलोत सरकार की तारीफ़ करना भी उनकी मजबूरी है । पेपर लीक मामले में उन्होंने मुख्य आरोपियों को पकड़ने की मांग की तो दूसरी ओर सरकार की इस बात के लिए जमकर तारीफ की कि उसने नकल करने वाले माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की यहां तक माफियाओं के परिसरों को भी ध्वस्त किया ।

निश्चय ही गहलोत की छाती पर मूंग दलने के लिए वे तेजी से सक्रिय हो गये है। सूत्रों से खबर मिली है कि मौजूदा समय में आलाकमान राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में नही है । मुखिया गहलोत भी इससे वाकिफ है और पायलट भी । इसलिए बेखौफ होकर गहलोत बजट पेश करने में तेजी से सक्रिय है। पायलट के पास अपनी ताकत का इजहार करने के लिए जगह जगह सभा करने के अलावा और कोई बेहतर विकल्प नही था। इसलिए वे प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में सभा आयोजित कर जनता के समक्ष अपनी जबरदस्त उपस्थ्ति दर्ज कराते रहेंगे ।

सवाल यह उत्पन्न होता है कि इन सभाओं से आखिर होगा क्या ? प्रदेश की जनता गहलोत और पायलट दोनो के जादू से बखूबी वाकिफ है। यह निर्विवाद सही है कि पायलट भीड़ जुटाने के बहुत बड़े जादूगर है। लोगो मे उनका जबरदस्त आकर्षण है। लेकिन इसका फायदा क्या । पिछले तीन साल से आलाकमान उनको केवल लॉलीपॉप ही चूसने को दे रहा है। समर्पित कार्यकर्ता के तौर पर वे तीन साल से आलाकमान के बहकावे में आकर अपनी दिशा तय नही कर पा रहे है।

पायलट को अब मुख्यमंत्री पद पाने की आस छोड़ देनी चाहिए। उन्हें यात्राओं के साथ साथ अपना राजनीतिक भविष्य तय करना होगा। बकौल राहुल गांधी के गहलोत और पायलट दोनो पार्टी की असेट है। लेकिन केवल असेट कह देने से थोड़े ही कुछ होने वाला नही है। पायलट की मजबूरी यह है कि वे कांग्रेस में रहते है तो उन्हें गहलोत की अधीनता स्वीकार करनी होगी। अगर वे ऐसा नही भी करते है तो अपनी सभाओं में गहलोत सरकार की झूठी मूठी प्रशंसा करना विवशता होगी।

अगर पायलट सीएम नही बन पाते है तो उन्हें संगठन की कुर्सी पर बैठ जाना चाहिए। सीएम और पीसीसी चीफ के अलावा उनके पास और कोई विकल्प नही है। अगर वे पीसीसी चीफ बन जाते है तो उनकी और उनके समर्थकों की इज्जत जरूर बच सकती है। अगर ऐसा नही हुआ तो उनके पास मौजूदा हवाई दौर में व्हाट्सएप खबरों के मुताबिक बीजेपी में जाने के अलावा कोई अन्य यात्रा का मकसद सुझाई दे रहा है और सम्भवतया पायलट भी इन बातों को बखूबी समझते है । इसलिए बुझे मन से सरकार की तारीफ करते हुए दूसरे गलियारे से सरकार के कामकाज पर प्रश्नचिन्ह लगाते है ।

सूत्रों से पता चला है कि आलाकमान के रवैये से पायलट बेहद खफा है। आलाकमान के नकारात्मक रवैये को देखकर ही पायलट ने सभाओं का आयोजन किया है। पायलट की यह आखिरी कोशिश है कि सभाओं को देखकर आलाकमान उनके पक्ष में कोई निर्णय ले ले। उधर मुखिया गहलोत ने बजट पेश करने की तारीख भी घोषित कर दी है। यद्यपि मुझे लगता नही है, लेकिन चर्चा है कि बजट अधिवेशन के दौरान गहलोत खुद ही सीएम की कुर्सी पायलट को सौप सकते है। एक चर्चा यह भी है कि 28 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में आसींद में बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर सकते है ।

सूत्रों का कहना है कि गहलोत के रहते हुए पायलट का कांग्रेस में कोई भविष्य नही है। अगर 2023 का चुनाव कांग्रेस जीत जाती है तो अशोक गहलोत का पुनः मुख्यमंत्री बनना लगभग तय है। अगर कांग्रेस चुनाव नही जीतती है तो भी पायलट के हाथ कुछ लगने वाला नही है। तस्वीर साफ है -कांग्रेस हारती है या जीतती है, लाभ पायलट को नही, मुखिया अशोक गहलोत को मिलेगा।

– राजस्थान से राजूचारण

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *